विधानसभा सत्र के पहले दिन राज्यपाल के बजट अभिभाषण के बहाने सरकार ने अपनी उपलब्धियों तो खूब गिनाई पर भविष्य की योजनाओं का स्पष्ट खाका पेश नहीं किया।
पलायन, रोजगार जैसी मूल समस्याओं का जिक्र भी हल्के-फुल्के अंदाज में किया गया। खास बात यह भी रही कि लगातार संसाधनों की कमी का जिक्र कर रही सरकार ने अपने स्तर से संसाधन बढ़ाने को भी तवज्जो नहीं दी।
रोजगार को सरकारी क्षेत्र में नौकरियों के हाल पर छोड़ दिया गया। औद्योगिक और सेवा क्षेत्र के विस्तार का भी कोई स्पष्ट खाका नहीं खींचा गया।
35 पेज के राज्यपाल के अभिभाषण में प्रदेश सरकार ने एक के बाद जारी योजनाओं का ब्यौरा पेश किया। अभिभाषण में कई उपलब्धियां गिनाई गईं।
अवस्थापना विकास प्रदेश के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा है। सड़क, पुल, रोपवे आदि के विकास की बात सरकार ने की पर यह स्पष्ट नहीं किया कि इन क्षेत्रों को कितनी प्राथमिकता दी जा रही है।
कृषि पर जोर दिया गया पर कृषि की मूल समस्याओं को लेकर भी कोई खाका नहीं खींचा गया। प्रदेश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का योगदान तेजी से कम हो रहा है। पिछले कुछ समय में प्राथमिक क्षेत्र की स्थिति में सुधार में सरकार को सफलता भी मिली है।
समस्याएं तो बताई लेकिन समाधान नहीं:
इतना होने पर भी रोजगार के लिए सरकार ने 30 हजार नई नियुक्तियों पर ज्यादा भरोसा किया है। ग्राम्य विकास के जरिये रोजागार को बढ़ावा देने, उद्योगों को रोप इन करने का भी कोई खाका पेश नहीं किया गया।
पलायन की समस्या को अभिभाषण में उठाया गया, लेकिन इस समस्या के समाधान के लिए कोई अलग से रोड मैप पेश नहीं किया गया।
अभिभाषण में इस बात का जिक्र तो किया गया कि 14वें वित्त आयोग की संस्तुतियों के कारण राज्य को 1500 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है, लेकिन इस बात का कोई जिक्र नहीं किया गया कि राज्य अपने संसाधन किस तरह से बढ़ायेगा।
नो टैक्स बजट:
मुख्यमंत्री हरीश रावत पहले ही कह चुके हैं कि इस बार नो टैक्स बजट रहेगा। वेट से प्रदेश सरकार को इस समय 10 प्रतिशत वृद्धि ही मिल रही है। खनन से प्रदेश सरकार को खासी उम्मीद है पर इसमे पर्यावरण का पेंच फंसा हुआ है।
सातवें वेतन आयोग की संस्तुतियों को लागू करने का जिक्र कर सरकार ने बड़े कर्मचारी वर्ग को साधन की कोशिश की है। लेकिन, इसमें भी सह स्पष्ट नहीं किया गया कि सातवें वेतन आयोग के लागू होने पर बढ़े हुए खर्च की भरपाई किस तरह से सरकार करेगी।