अब जल्द ही भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की पहचान को कम कर देगा।
शीशम, इमारती लकड़ी में सबसे मजबूत मानी जाने वाली इस प्रजाति के निर्यात के मामले में भारत पाकिस्तान को टक्कर देने को तैयार है।
पढ़ें, भाजपा को जिताने लोकसभा चुनाव में उतरेंगे एनडी तिवारी
देहरादून स्थित एफआरआई के वैज्ञानिकों ने वर्षों के शोध के बाद ऐसी शीशम बना ली है, जो पाकिस्तान के चंगा मंगा की शीशम के मुकाबले कहीं अधिक बेहतर मानी जा रही है।
तैयार की गई हाइब्रिड शीशम
सामान्य शीशम के पेड़ में जहां लकड़ी का 30 फीसदी हिस्सा लाल होता है, वहीं इस नई प्रजाति में 70 प्रतिशत लकड़ी लाल होगी।
पढ़ें, 'पाताल' में है उत्तराखंड का यह अंतिम मतदान केंद्र
एफआरआई में पांच साल पूर्व शीशम पर काम शुरू हुआ। वैज्ञानिकों ने पाकिस्तान बार्डर, असम और नेपाल से शीशम के 300 जेनेटिक सैंपल जुटाए। इन्हें डीएनए प्रक्रिया से गुजारने के बाद हाइब्रिड शीशम तैयार की गई।
खास बात यह है कि सामान्य प्रक्रिया से इस काम में लगने वाले 25 से 30 साल के वक्त को भी बायो टेक्नोलॉजी और डीएनए लैब की मदद से महज पांच वर्ष कर दिया गया।
पौधा एक साल का, गुण 40 साल के
वैज्ञानिकों का दावा है कि इस शीशम की उत्पादकता आम शीशम की तुलना में तीन से चार गुना ज्यादा होती है।
आम शीशम से पांच घन मीटर तक लकड़ी मिलती है, लेकिन इस प्रजाति से 15 से 20 घन मीटर लकड़ी मिलेगी।
पढ़ें, यहां जीतने के लिए दूसरे 'ग्रह' पर जाते हैं नेताजी
एफआरआई के महानिदेशक डॉ. पीपी भोजवैद्य ने जेनेटिक लैब के वैज्ञानिकों को कामयाबी पर बधाई दी। उन्होंने कहा है कि विज्ञान और तकनीक के सहयोग से निश्चित तौर पर वानिकी में विकास तेज हो रहा है।
वैज्ञानिकों द्वारा विकसित शीशम की प्रजाति के एक साल आयु वाले पौधों में 40 वर्ष उम्र के सामान्य शीशम के पेड़ के सारे गुण मौजूद हैं। यही वजह है कि इससे तेजी से और अधिक उत्पादन हासिल किया जा सकता है।
खास बात यह है कि आमतौर पर शीशम में लगने वाली ‘डाई बैक’ बीमारी से बचाने के लिए इस पौधे के जेनेटिक कोड को खासा मजबूत बनाया गया है। यानी यह पेड़ बीमारियों से भी बचा रहेगा।