महिला समाख्या और वॉयलेंस अगेंस्ट वूमेन नेटवर्क की ओर से सर्वे ऑडिटोरियम, हाथीबड़कला में फिल्म फेस्टिवल के पहले दिन शुक्रवार को ‘बवंडर’ और ‘अर्थ’ दिखाई गईं।
फिल्म के बाद हुई गोष्ठी
‘बवंडर’ में भंवरी बलात्कार कांड की कहानी दिखाए जाने के बाद इस पर गोष्ठी कराई गई। ‘अर्थ’ दिखाए जाने के बाद महिलाओं के मन में पनपने वाले असुरक्षा के भावों पर चर्चा हुई। फिल्मों के बाद दर्शकों के साथ सवाल-जवाब का खुला सेशन रखा गया।
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एक छात्रा ने पूछा कि महिलाओं के प्रति सम्मान की नींव कैसे रखी जाए। वक्ताओं का जवाब था कि एक मां का कर्तव्य है, बच्चों को अच्छी शिक्षा देना। जिस तरह वह बेटी को अच्छी आदतें सिखाती है, देर रात बाहर रहने को मना करती है, ठीक यही बातें बेटे को भी बताएं।
फिल्मों में निर्देशक डाल देते हैं बेवजह मसाला
‘बवंडर’ की लेखिका सुधा अरोड़ा का कहना था कि सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्मों में भी निर्देशक मनमुताबिक मसाला डाल देते हैं। महिलाओं के हालात और उनसे बर्ताव की असलियत छुपा लेते हैं। फिर ऐसे दृश्य फिल्मों में कंकड़ की तरह चुभते हैं।
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सुधा के मुताबिक वर्ष 1995 में राजस्थान में हुए भंवरी बलात्कार के बाद पीड़िता को न्याय नहीं मिला तो कई लेख लिखे। वर्ष 2000 में भंवरी पर फिल्म की कहानी लिखने को कहा गया। मैंने हूबहू वही लिखा, जो भंवरी के साथ हुआ।
वर्ष 2001 में फिल्म तैयार हुई तो इसे देखने के बाद हैरान रह गई। जो दृश्य फिल्म का अहम हिस्सा हो सकते थे, वो थे ही नहीं।
निर्भयाकांड याद कर सिहर उठती हूं: असीमा
‘कलर्स’ चैनल पर ‘मोहे रंग दे, बैरी पिया’ जैसे सीरियल्स में काम करने वाली असीमा भट्ट ने बताया कि निर्भया कांड पर एक न्यूज चैनल ने एक डॉक्यूमेंट्री बनाई। इसमें आवाज मेरी थी।
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रूंधे गले से असीमा ने कहा कि इस डॉक्यूमेंट्री ने मुझे पूरी तरह झकझोर दिया। जब भी वह कांड याद आता है, बेहद परेशान हो जाती हूं।