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नरेंद्र मोदी को टक्कर दे रहे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री

Fri, 02 May 2014 08:47 AM IST
अनूप वाजपेयी / अमर उजाला, देहरादून
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पूरे देश में नरेंद्र मोदी के सीधे निशाने पर गांधी परिवार और कांग्रेसी सरकारों की नीतियां हैं लेकिन उत्तराखंड में उन्हें तीन महीने पुराने मुख्यमंत्री हरीश रावत से चुनौती मिल रही है।
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यहां मोदी के लड़ाकों को रोकने में कांग्रेस के लिए सोनिया और राहुल गांधी से अधिक हरीश रावत के नाम का अस्त्र कारगर साबित माना जा रहा है।

कांग्रेस उन्हें ‘सुपरमैन’ की तरह पेश कर चुनाव को स्थानीय मुद्दों से जोड़ने की कोशिश में लगी है।

खुद हरीश रावत अपने काम का हवाला तो दे ही रहे हैं मोदी और गुजरात मॉडल पर चुटीले व तीखे प्रहार से भी नहीं चूक रहे।

दो ‌हिस्सों में बटकर ‌कर रहे जीत पक्की

दूसरी ओर, भाजपा इस चुनाव को पूरी तरह से नरेंद्र मोदी के आसपास राष्ट्रीय मुद्दे उठाकर लड़ना चाह रही है। भाजपा प्रत्याशी और नेता अपने भाषणों और अपील में मोदी का जिक्र करना कतई नहीं भूलते।

लोकसभा चुनाव को लेकर माहौल गरमाने से पहले ही इस बात पर कांग्रेस की सियासत गर्मा गई थी कि मुख्यमंत्री सिर्फ तीन सीटें ही जिताने की बात कह रहे हैं।

तब मुख्यमंत्री ने इसका खंडन भी किया था। अब कांग्रेस के नेता पांचों सीटें जीतने के लिए जी-जान से जुटे हैं लेकिन दो हिस्सों में बंटकर।

हरिद्वार और अल्मोड़ा लोकसभा सीटों की लड़ाई में सीधे तौर पर हरीश रावत फैक्टर ही काम कर रहा है। हरिद्वार की उनकी ही सीट से पत्नी रेणुका रावत मैदान में हैं। अल्मोड़ा उनका गृह जनपद और पुराना संसदीय क्षेत्र है।

नैनीताल सीट पर भी रावत का दखल

कुमाऊं में लंबे समय तक सक्रिय रहने के चलते नैनीताल सीट पर भी रावत का दखल है। केसी सिंह बाबा के साथ जुड़कर यह सीट रावत समर्थक अपने खाते में ही दिखाना चाहते हैं। यही वो तीनों सीटें हैं, जिसकी बात रावत विरोधी कर रहे थे।

टिहरी और पौड़ी संसदीय सीटों पर भी हरीश रावत लगातार दौरे और जनसभा कर रहे हैं। इन दोनों सीटों पर भी उनकी फेस वैल्यू है, लेकिन यहां होने वाली जीत-हार का हिसाब-किताब हरीश रावत के खाते में नहीं जाएगा।

टिहरी में ना तो विजय बहुगुणा इसका क्रेडिट हरीश रावत को देंगे और न ही पौड़ी में हरक सिंह रावत। टिहरी में कांग्रेस उम्मीदवार साकेत बहुगुणा हारते हैं तो इसे विजय बहुगुणा सरकार के कार्यकाल से ही जोड़कर देखा जाएगा।

मुख्यमंत्री का फोकस टिहरी-पौड़ी पर

पौड़ी से उम्मीदवार हरक सिंह रावत चुनाव अपने दमखम पर लड़ रहे हैं, जो बहुगुणा के भी करीबी माने जाते हैं। ऐसे में हार-जीत का हिसाब भी उनके खाते में ही जाना है।

वैसे, हाईकमान की ओर से पांचों सीटों पर प्रचार का जिम्मा मुख्य रूप से हरीश रावत पर ही है। मुख्यमंत्री का फोकस टिहरी-पौड़ी पर भी है।

लेकिन कहा यह भी जा रहा है कि अंदरखाने कांग्रेस उम्मीदवार कतई नहीं चाहते कि वहां मुख्यमंत्री का चेहरा आगे करके चुनाव लड़ा जाए। बावजूद इसके कार्यकर्ता मोदी की काट के रूप में मुख्यमंत्री पर भरोसा जता रहे हैं।
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पिछली बार जीतने वाले तीन इस बार नहीं

2009 में कांग्रेस ने पांचों सीटों पर जीत हासिल की थी। हरीश रावत हरिद्वार से, पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा टिहरी, केसी सिंह बाबा नैनीताल, अल्मोड़ा से प्रदीप टम्टा और पौड़ी से सतपाल महाराज जीतकर संसद पहुंचे थे।

इस बार केसी सिंह बाबा और प्रदीप टम्टा को छोड़कर बाकी तीनों नेता अलग-अलग कारणों से चुनाव मैदान में नहीं हैं। महाराज तो अब भाजपा के साथ हैं।

दो अन्य नेता खुद तो नहीं लड़ रहे लेकिन विजय बहुगुणा बेटे साकेत के लिए और हरीश रावत पत्नी रेणुका रावत के लिए जी जान से जुटे हैं।

विजय बहुगुणा के मुख्यमंत्री बनने से टिहरी लोकसभा सीट खाली हुई और यहां उनके बेटे साकेत बहुगुणा ने उप चुनाव लड़ा था। 2012 में भाजपा की माला राज्यलक्ष्मी शाह ने यह सीट कांग्रेस से छीन ली थी।

भाजपा के तीन पूर्व मुख्यमंत्री मैदान में
भाजपा ने इस बार अपने तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों भुवन चंद्र खंडूड़ी, रमेश पोखरियाल निशंक और भगत सिंह कोश्यारी को मैदान में उतारा है।

टिहरी पर एक बार फिर माला राज्यलक्ष्मी 2012 के पुराने प्रतिद्वंद्वी के मुकाबिल हैं। अल्मोड़ा सुरक्षित सीट पर भाजपा ने विधायक अजट टम्टा को वर्तमान सांसद प्रदीप टम्टा के खिलाफ उतारा है।
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