सुधांशु ने 2014 के बाद 2016 में यूपीपीसीएस परीक्षा के लिए आवेदन किया था, मगर यह परीक्षा किन्हीं कारणों से रद्द हो गई थी। इसके बाद छोटे मोटे काम कर अपना खर्च चलाने लगा, लेकिन अधिकारियों बनने की ललक उसे सता रही थी। यही कारण था कि वह सब कुछ छोड़कर झूठ की जिंदगी जीने लगा।
उसने अपना रहन सहन अधिकारियों के जैसा ही बना लिया। कार भी ले ली और शादी के बाद एक बड़ा मकान किराए पर ले लिया। हर रोज पार्टी करना और बड़े बड़े लोगों के साथ उठना बैठना अब उसकी आदत में शुमार हो गया। इसके बाद जब खर्च पूरे नहीं हुए तो उसने जनवरी 2018 से खुद को पीसीएस अधिकारी बताना शुरू कर दिया। कार पर उत्तराखंड सरकार का बोर्ड लगाकर घूमने लगा।
फिर धीरे धीरे लोग उसकी बातों और ठाठ-बाट देख उस पर विश्वास करने लगे। सुधांशु ने बताया कि उसे लगता था कि वह किसी की पकड़ में नहीं आएगा और जल्द ही अमीर बन जाएगा। लेकिन, सपने पूरे करने लिए जो रास्ता उसने चुना था वह जेल में जाकर खत्म हुआ।
सुधांशु हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर अच्छी पकड़ रखता है। उसने किसी अन्य को अपना राजदार नहीं बनाया था। यह सोचकर कि कोई उसकी पोल खोल देगा। उसने कभी सरकारी कागजों को नहीं देखा था। लिहाजा उसने जो भी कागजात बनाए खुद की समझ से बनाए। चूंकि उसके पास विभागों के लेटर हेड या अन्य प्रपत्रों का प्रारूप नहीं था तो उसने कई गलतियां भी कीं। यही गलती अब उसके खिलाफ जालसाजी के आरोप को तय करने के लिए काफी होंगी।