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एक्सक्लूसिव: कपिल ने आपदा को अवसर में बदला, मत्स्य पालन को बनाया आजीविका का जरिया

Tue, 02 Feb 2021 06:46 PM IST
अलका त्यागी खड़क सिंह गैड़ा, अमर उजाला, खटीमा
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
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आपदा को अवसर किस तरह बदला जाता है, यह साबित किया है भारत-नेपाल सीमा से लगे झनकईया क्षेत्र के तलवार फार्म निवासी कपिल तलवार ने। कोरोना काल में हेल्थ केयर सेंटर बंद हुआ तो उन्होंने हिम्मत हारने के बजाय मत्स्य पालन का काम शुरू कर दिया। इसके लिए उन्होंने बायोफ्लॉक तकनीक अपनाई। सफलता मिलने के बाद अब वह और लोगों को भी मत्स्य पालन के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

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कपिल तलवार के अनुसार बायोफ्लॉक तकनीक से मत्स्य पालन में टैंक में उपकारी बैक्टीरिया की मदद से मछलियों की विष्ठा और अतिरिक्त भोजन को प्रोटीन सेल में परिवर्तित कर मछलियों के भोज्य पदार्थ के रूप में रूपांतरित कर दिया जाता है। इस तकनीक के कई फायदे हैं। अव्वल तो कम जगह में मछली पालन कर सकते हैं। साथ ही इसमें पानी की बचत के साथ ही मछलियों के भोजन में भी काफी बचत होती है। 

टैंक में ऐसे तैयार होती हैं मछलियां
तलवार के अनुसार उन्होंने 2000 स्क्वायर फीट में 15 हजार लीटर क्षमता के चार टैंक लगाए हैं। इनमें प्रत्येक टैंक में कोलकाता से माधोटांडा यूपी के जरिये मंगाए गए पांच हजार सिंघी मछली के बीज डाले गए। प्रत्येक मछली का वजन डालते समय लगभग पांच ग्राम होता है। करीब 100 से 125 ग्राम वजन होने पर इन मछलियों की बिक्री शुरू हो जाती है। इन टैंकों में आक्सीजन के साथ पानी का तापमान 19 से 20 डिग्री तक रखा जाता है। इसके लिए 24 घंटे मोटर चलती है। टैंकों में समय पर दवाइयां भी डाली जाती हैं।
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जिंदा सिंघी मछली होती है उपभोक्ताओं की पहली पसंद
कपिल तलवार बताते हैं कि मार्केटिंग की उन्हें कोई चिंता नहीं रहती है। उपभोक्ताओं की पहली पसंद जिंदा सिंघी मछली होती है। मछली बेचने वाले खुद ही उनके प्लांट पर आते हैं और मछली खरीदकर ले जाते हैं। उत्पादन बढ़ने पर वह अन्य शहरों में भी मछली की सप्लाई करेंगे। मत्स्य पालन में वरिष्ठ किसान नरेश तलवार और उनके छोटे पुत्र तशीत भी कपिल की मदद करते हैं।

टैंक का जरूरी तापमान बनाए रखना आवश्यक
बायोफ्लॉक तकनीक में तय तापमान बनाए रखना जरूरी है। क्योंकि हर मछली को एक निश्चित तापमान चाहिए होता है। इसलिए पॉलीशेड और तापमान को नियंत्रित करने की व्यवस्था करनी पड़ती है। वहीं 24 घंटे बिजली की व्यवस्था भी होनी चाहिए। क्योंकि इसमें जो बैक्टीरिया पलता है वह ऐरोबिक बैक्टीरिया है, जिसे 24 घंटे हवा की जरूरत होती है और तभी वह जीवित रहता है।

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