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एक्सक्लूसिव इंटरव्यू: देश में क्यों बढ़ रही बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं? वाडिया संस्थान के निदेशक ने बताए कारण

Sun, 06 Sep 2026 01:35 PM IST
Alka Tyagi अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून

सार

उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदाएं बढ़ रही हैं। वहीं, देश में भी हाल ही में कई जगहों पर त्रासदी देखने को मिल रही है। ये आपदाएं क्यों बढ़ रही हैं इसकी वजह बताई है वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के निदेशक विनीत गहलोत ने।
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वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के निदेशक विनीत गहलोत - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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उत्तराखंड में मानसून के समय प्राकृतिक आपदाओं की संख्या बढ़ जाती है। पिछले वर्ष धराली जैसी आपदाओं में जानमाल का भारी नुकसान हुआ। वहीं, अब नेपाल की त्रासदी ने भी सभी को झकझोरा हुआ है। वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के निदेशक विनीत गहलोत से प्राकृतिक आपदाओं की घटनाओं के कारणों के जानने, हिमनद झीलों के विस्फोट जोखिम समेत अन्य विषयों को लेकर अमर उजाला संवाददाता विजेंद्र श्रीवास्तव ने बातचीत की।

सवाल: जलवायु परिवर्तन से प्राकृतिक आपदा का खतरा कितना बढ़ा है?

जवाब- जो आपदाएं पर्वतीय या अन्य क्षेत्रों की हैं, वह सर्वविदित हैं। हिमालय नए हैं, इसलिए उनकी तीव्रता और संख्या ज्यादा होती है। प्राकृतिक आपदा हर जगह होती है, चाहे वह भूस्खलन, भूकंप, बाढ़, बादल फटना आदि हो। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव दिखाई दे रहा है, आकड़े बता रहे हैं कि भूस्खलन और बाढ़ की घटनाएं बढ़ गई हैं। बाढ़ की घटना बादल फटने, तीव्र बरसात या हिमनद झील के फटने की वजह से हो सकती है। बारिश तब होती है जब सही तापमान, हवा की दिशा ठीक हो, आर्द्रता बराबर हो। इसमें कोई बदलाव होता है, तो सभी चीजों में बदलाव दिखाई देता है। जरा भी तापमान बढ़ता है तो इससे प्रक्रियाओं पर असर पड़ता है और बड़ा बदलाव दिखाई देने लगता है। बारिश और उसकी तीव्रता बढ़ गई है। बाढ़ और भूस्खलन हो रहे, यह उसी का प्रभाव है। किसी भी इलाके में होने वाली बारिश की कुल मात्रा में बदलाव नहीं हुआ है, पर उसकी तीव्रता, समय और वितरण बदल गया है, कम समय में बहुत बारिश हो जाती है। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव इकोलॉजी में दिखाई दे रहा है, ट्री लाइन भी शिफ्ट हो रहे हैं। जहां पर बर्फ पड़ती थी, वहां पर बारिश हो रही है। स्नो लाइन शिफ्ट हो गई है।

सवाल- राज्य की हिमनद झीलों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने के लिए आपके संस्थान को नोडल एजेंसी बनाया गया, इसको को लेकर क्या काम हो रहे हैं?

जवाब- राज्य में पांच हिमनद झीलें हैं, जिन पर हमारा अधिक फोकस है। यह वह पांच झीलें हैं, जो कभी संकट उत्पन्न कर सकती हैं। इनसे किस तरह यह आपदा आ सकती है, यह आपदा एवलाॉंच, भूस्खलन, बारिश या अन्य किस कारण हो सकती है, इसका आकलन किया जाना है। इस आकलन के लिए जरूरी है कि मल्टी लेयर्ड अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाया जाए। हिमनद झील के साथ ही उसके प्रवाह स्थल पर अलग-अलग जगह लगाया जाए। जिससे अगर एक जगह से सूचना न मिले (जैसे अत्यधिक बर्फबारी, बिजली गिरने, ग्लेशियर गिरने या नेटवर्क फेल होने से) तो दूसरी जगह से सूचना प्राप्त हो सके। इसके साथ ही उपकरण उन जगहों पर भी लगाया जाना चाहिए, जहां पर वह सारे प्रवाह स्थल मिलते हों। इससे केवल हिमनद झील ही नहीं अन्य कारणों से भी पानी का प्रवाह बढ़ रहा और या अन्य असामान्य स्थिति दिखाई दे, तो तत्काल अलर्ट किया जा सके। पर इन प्रयासों के साथ लोगों को जागरूक होना जरूरी है। संवेदनशील जगहों पर लोगों की बसावट न हो। अगर कोई संवेदनशील जगह की पहचान हुई तो वहां से लोगों का दूसरी जगह पर पुनर्वास किया जाए। इस साल उत्तराखंड में वसुंधरा झील पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की योजना है।

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सवाल- भूकंप को लेकर उत्तराखंड कितना संवेदनशील है, अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने को लेकर क्या कार्य हुआ?

जवाब- उत्तराखंड का इलाका भूकंप को लेकर बहुत संवेदनशील है। करीब 600 साल से बड़ा कोई भूकंप नहीं आया है, ऐसे में अगर बहुत अधिक संवेदनशील इलाके की बात करें तो वह कुमाऊं का इलाका है। आईआईटी रुड़की ने राज्य में 250 अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाए हैं। इन्हें लेकर उन्होंने भूदेव एप विकसित किया है। भूकंप रेयर होता है, पर यह बहुत नुकसान करता है। भूकंप कब आएगा, उसका पता नहीं चलता। पर अगर वह आता है तो उसके प्रभाव को कम किया जा सके, इस पर भी फोकस बढ़ाया गया है। भूकंप के प्रभाव से निपटने को लेकर लोगों को और अधिक जागरूक करना होगा।

सवाल- हिमालय से जुड़ीं चुनौतियों को लेकर अलग-अलग संस्थाएं काम कर रही हैं, क्या उनको एक साथ काम करने की जरूरत महसूस की जा रही है?

जवाब- हर व्यक्ति हर चीज में विशेषज्ञ नहीं हो सकता है। ऐसे में मिलकर कार्य करने की जरूरत है। अगर हिमनद झील विस्फोट के जोखिम की बात करें तो इस दिशा में समन्वय देखने को मिल रहा है। वाडिया, एनआईएच, सीबीआरआई जैसे संस्थान अपनी-अपनी विशेषज्ञता के आधार पर कार्य बांटने के साथ समन्वय के साथ काम कर रहे हैं। यह बात सही है कि सामान्य तौर पर संस्थानों के बीच समन्वय नहीं हो पाता है पर मिलकर कार्य करने की जरूरत है।
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