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एक्सक्लूसिव: भूकंप आया तो तराई के लिए होगा विनाशकारी साबित, यहां तक होगा जलजले का असर

Tue, 11 Feb 2020 05:30 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal जीवन कुमार / अमर उजाला, रामनगर (नैनीताल)

सार

  • नंदपुर में पहाड़ी पर जांच में जुटी आईआईटी कानपुर की टीम ने जताई आशंका
  • इलाहाबाद और दिल्ली से भी आगे तक रहेगा इस जलजले का असर
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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भारत का हिमालयी क्षेत्र भूकंप जोन पांच के अंतर्गत है, जो कि अत्यधिक खतरनाक जोन है। उत्तराखंड के तराई क्षेत्र में काफी समय से भूकंप की आशंका बनी हुई है। ऐसे में यदि तराई में भूकंप आता है तो इसका असर इलाहाबाद और दिल्ली से भी आगे तक होगा।

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रामनगर और हल्द्वानी में यह विनाशकारी साबित होगा। भूगर्भ वैज्ञानिकों की मानें तो इस इलाके में 1505 से कोई भूकंप नहीं आया, इसलिए यहां आशंका बन रही है कि रिक्टर पैमाने पर 7 और 8 प्वांइट का भूकंप खतरनाक हो सकता है।

आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिक प्रोफेसर जावेद मलिक की अगुवाई में भूगर्भ वैज्ञानिकों की टीम रामनगर पहुंची है। टीम ने ग्राउंड प्रेनेट्रेटिंग रडार (जीपीआर), ग्लोबल पोजिशन सिस्टम (जीपीएस) और सेटेलाइट के जरिए पहाड़ और तराई में 1505 में आए भूकंप के निशान तलाशे और उस जगह को चिन्हित किया।
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यह जगह रामनगर-हल्द्वानी मार्ग पर 15 किमी की दूरी पर नंदपुर गांव में नजर आई। यह स्थान पहाड़ी से लगा हुआ है। वैज्ञानिकों ने जमीन से पहाड़ की ओर 200 मीटर की जगह को चिन्हित किया और बाद में जेसीबी की मदद से खुदाई शुरू की। 

लंबे समय से यहां नहीं आया  बड़ा भूकंप

जेसीबी करीब दस से बारह फुट तक खुदाई कर रही है। वैज्ञानिक पता लगा रहे हैं कि समतल जमीन में कितना झुकाव आ चुका है। इससे पता लगाया जा सके कि इस क्षेत्र में भूकंप कब आ सकता है। यह कार्य 15 फरवरी तक चलेगा।

वैज्ञानिकों की मानें तो यहां भूकंप आने की आशंका सबसे ज्यादा है, भूकंप से बचने के उपायों पर अभी तक ध्यान देने की जरूरत है। भूकंप आया तो रामनगर, हल्द्वानी, दिल्ली, इलाहाबाद से भी अधिक क्षेत्र में तबाही मच जाएगी और तराई का इलाका पूरी तरह से प्रभावित होगा।
 

आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिक प्रो. जावेद मलिक के अनुसार हिमालयी क्षेत्र में पचास साल के अंतराल में केंद्र बदल-बदल कर भूकंप आ रहे हैं। वर्ष 1905 में कांगड़ा धर्मशाला हिमाचल, 1934 में बिहार-नेपाल बॉर्डर, 1950 में असोम, 2005 में कश्मीर और 2015 में नेपाल में बड़े भूकंप आए थे।

ये सभी भूकंप हिमालय के ऊपरी हिस्सो में आए। अनुमान है कि जिस स्थान पर खुदाई की जा रही है वहां पर वर्ष 1505 में भूकंप आया था और 1803 में यहां से कुछ दूरी पर पहाड़ों के बीच में भूकंप आया था। माना जाता है कि जिस स्थान पर तीव्र गति वाला भूकंप आता है, वहां पांच या छह सौ साल बाद भूकंप जरूर आता है।

भयंकर तबाही मच सकती है

अहमदाबाद वैज्ञानिक डॉ. एमएस गड़वी ने बताया कि इस स्थान पर सेंट्रल सैसमिक गैप (भूकंपीय अंतराल) बन गया है। सेंट्रल साइससिक गैप यानी जमीन के अंदर की टेक्टोनिक प्लेट्स में झुकाव आना शुरू हो गया, जो कभी भी मूवमेंट कर सकती है और इससे भयंकर तबाही मच सकती है।

टीम यहां पर जांच पड़ताल कर रिपोर्ट को पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय को सौंपेगी। उन्होंने बताया कि इसके बाद चोरपानी में खुदाई की जाएगी, लेकिन सीटीआर इसमें अड़चन पैदा कर रहा है, जो ठीक नहीं है।
 
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2018 में भी हेलीकॉटर से की थी जांच

दिसंबर 2018 में बंगलूरू से आई भूगर्भ वैज्ञानिकों ने हेलीकॉप्टर पर मैगनेटिक प्लेट बांधकर रामनगर से लेकर कालाढूंगी तक उड़ान भरी थी। तीन दिन की जांच पड़ताल के दौरान टीम ने भी टेक्टोनिक प्लेट्स की मूवमेंट को भांपने का काम किया था। अब यह टीम खुदाई करके जांच पड़ताल कर रही है। 

यह है वैज्ञानिकों की टीम

आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिक प्रो. जावेद मलिक, एलडी इंजीनियरिंग कालेज अहमदाबाद के वैज्ञानिक डॉ. एमएस गड़वी, उत्कल विश्वविद्यालय भुवनेश्वर उड़ीसा के वैज्ञानिक डॉ. शांति स्वरूप शाहू के नेतृत्व में आईआईटी कानपुर से भूगर्भ विभाग के वैज्ञानिक अजहद, सिराज, नयन, इशान व मिठ्ठू टीम में शामिल हैं। दूरदर्शन के रामचंद्रा, भरत लाल भी इस पर डाक्यूमेंट्री बना रहे हैं जिसे दूरदर्शन चैनल पर प्रसारित किया जाएगा।
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