उत्तराखंड की ग्रीन बोनस की मांग के बीच सरकार से सकल पर्यावरण उत्पाद (जीईपी) को तवज्जो देने की मांग की गई है। पर्यावरणविद और हैस्को के संस्थापक निदेशक डॉ. अनिल जोशी का कहना है कि हिमालयी संसाधनों को लेकर दो बातें साफ होनी चाहिए। पिछले सौ सालों में ग्लेशियर, नदी, वन के हालात पर कभी गंभीर समीक्षा नहीं की गई। प्रदेश को यह जानना चाहिए कि उसके संसाधनों की वर्तमान हालत क्या है।
सकल पर्यावरणीय उत्पाद एक ऐसी पहल है, जो संसाधनों की वृद्धि पर केंद्रित है। इसमें आर्थिकी की तर्ज पर पारिस्थितिकी संसाधनों का ब्यौरा जुड़ा है। यह भी जानना जरूरी है कि ग्लेश्यिर, नदी, वन आदि प्रदेश के आर्थिक विकास के हिसाब से उसी वर्ष में कितने बेहतर हुए। जीईपी से देश का हित भी जुड़ा हुआ है। जंगल, पानी, हवा, मिट्टी को पैदा करने वाले पर्यावरण को भी उद्योग का दर्जा मिलना चाहिए।
जीईपी से पारिस्थितिकी में स्थिरता आएगी और हिमालय की आर्थिकी में नए आयाम जुडेंगे। जीईपी की यह मांग केदारनाथ आपदा के तुरंत बाद उठी थी। उस समय तत्कालीन प्रदेश सरकार ने जीईपी का आकलन करने के लिए उच्च स्तरीय कमेटी का गठन भी किया था। इस कमेटी में वन एवं पर्यावरण से जुड़े प्रतिष्ठित संस्थानों के प्रतिनिधियों को शामिल किया गया था। इस कमेटी की दो बैठकें भी हुईं, लेकिन इसके बाद यह मसला ठंडे बस्ते में चला गया।