लोगों के बीच पर्यावरणविद् डॉ.अनिल प्रकाश जोशी
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पर्यावरणविद् डॉ.अनिल प्रकाश जोशी ने कहा कि प्रकृति की अनदेखी कर विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। आज दुनिया जिस पर्यावरणीय संकट का सामना कर रही है, वह ऐसे विकास मॉडल का परिणाम है, जिसमें उपभोग और भौतिक सुख-सुविधाओं को प्राथमिकता दी गई, लेकिन प्रकृति की सीमाओं और भविष्य की जरूरतों की अनदेखी की गई है। उन्होंने प्रकृति संरक्षण के लिए ग्रामोन्मुखी विकास, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील शिक्षा को आवश्यक बताया।
डॉ. जोशी सोमवार को अपनी 50 दिवसीय अंतरराष्ट्रीय साइकिल यात्रा के क्रम में देवघर के होटल रॉयल पैलेस में आयोजित ‘बढ़ते पर्यावरणीय संकट और हमारा भविष्य’ विषयक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। प्रवाह संस्था की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में देवघर सहित पाकुड़, दुमका, महेशपुर, गोड्डा और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से आए लोगों, आदिवासी समुदाय के प्रतिनिधियों तथा विभिन्न सामाजिक संगठनों के सदस्यों ने भाग लिया।
गांव नदियों, जंगलों और जल स्रोतों के संरक्षण की महत्वपूर्ण कड़ी
डॉ. जोशी ने झारखंड और उत्तराखंड को प्रकृति के प्रति संवेदनशील दो भाई राज्य बताते हुए कहा कि दोनों की पहचान पहाड़ों, जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी है। प्रकृति संरक्षण के लिए गांवों और स्थानीय समुदायों को विकास की मुख्यधारा में सम्मानजनक स्थान देना होगा। गांव नदियों, जंगलों और जल स्रोतों के संरक्षण की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। उन्होंने आदिवासी समुदाय के पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति के साथ उनके जीवन संबंध का उल्लेख करते हुए कहा कि पर्यावरण संबंधी नीतियां बनाते समय उनके अनुभवों को भी उचित महत्व दिया जाना चाहिए।
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इससे पहले कार्यक्रम की शुरुआत आदिवासी महिलाओं के पारंपरिक झारखंडी लोकगीतों, लोकनृत्य और स्थानीय वाद्ययंत्रों के साथ हुई। प्रवाह संस्था के संस्थापक दिलीप दुबे ने पुष्पगुच्छ भेंट कर डॉ.जोशी का स्वागत किया। इस अवसर पर संवाद संस्था के घनश्याम, कृषि विज्ञान केंद्र की प्रमुख डॉ.पूनम सोरेन आदि समेत कई लोग मौजूद रहे।