उत्तराखंड में 108 आपात सेवा को किफायती बनाने के लिए अब राज्य योजना आयोग को जिम्मा सौंपा गया है।
सरकार इस सेवा पर सालाना 15 करोड़ तक का खर्च वहन कर रही है, अब प्रशासनिक और संचालन लागत में सुधार की गुंजाइश तलाशी जा रही है। आयोग 150 दिन में सेवा का अन्य राज्यों के सापेक्ष मूल्यांकन कर खर्चों में सुधार की रिपोर्ट देगा।
पीपीपी मोड में संचालित 108 आपात सेवा पर स्वास्थ्य विभाग का भारी-भरकम खर्च हो रहा है। योजना लाभ हानि रहित संस्था जीवीके ईएमआरआई संचालित कर रही है, जिसके तहत प्रदेशभर में 139 एंबुलेंस चल रही हैं। वर्ष 2008 से 2013 तक राज्य की बजट में हिस्सेदारी 60 प्रतिशत थी जबकि एनएचएम के तहत 40 प्रतिशत बजट व्यवस्था थी, अब राज्य की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत कर दी गई है।
ऐसे में स्वास्थ्य विभाग सेवा के स्तर को सुधारने के साथ पूंजीगत व संचालन व्यय को कॉस्ट इफेक्टिव बनाने में योजना आयोग की मदद लेगा। स्वास्थ्य विभाग के अनुरोध पर प्रमुख सचिव नियोजन ने इस सेवा के मूल्यांकन अध्ययन का निर्णय लिया है। राज्य योजना आयोग ने संचालित 108 एंबुलेंस की उपयोगिता का मूल्यांकन अध्ययन परिकल्प जारी कर दिया है।
अध्ययन के यह हैं उद्देश्य
- सेवाओं का प्रशासनिक, संचालन लागत का विश्लेषण
- बीपीएल और एपीएल के लिए उपयोगिता का आकलन
- 108 की सभी सेवाओं पर हो रहे खर्च का आकलन
- एंबुलेंसों में स्टाफ की निरंतर उपलब्धता का विश्लेषण
- इसके संचालन में हो रहा व्यय और उसकी उपयोगिता
- अन्य प्रदेशों के सापेक्ष कुल लागत तथा संचालन व्यय
- एनएचएम के अनुदान का होगा तुलनात्मक विश्लेषण
- सरकार संग एमओयू के सापेक्ष खर्च व सेवा अध्ययन
यह होगी अध्ययन पद्वति
योजना का मूल्यांकन अध्ययन आधार गर्भावस्था संबंधी उपचार वर्ष 2009 से 2014 तक से किया जाएगा। जिन जनपदों में सर्वाधिक और न्यूनतम गर्भावस्था उपचार का लाभ मिला है, ऐसे मैदान में दो और पर्वतीय क्षेत्र में दो जनपद चिन्हित किए जाएंगे।
चयनित जनपदों में पेट, हृदय रोग लाभार्थियों से साक्षात्कार, चयनित जनपदों में उपलब्ध वाहनों से 50 प्रतिशत का भौतिक सत्यापन भी किया जाएगा। अध्ययन के लिए आयोग 150 दिन का समय लेगा।