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यहां गजराज ने 196 परिवारों को कर दिया बेघर

Thu, 08 Jun 2017 02:42 PM IST
विजेंद्र श्रीवास्तव/ अमर उजाला, देहरादून
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elephant - फोटो : google
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हाथी, सूअर, बंदर आदि खेत और किसानों की मेहनत के दुश्मन बन गए हैं। हाथियों ने 196 परिवारों के मकानों को तोड़ने के साथ बेघर कर दिया। यही नहीं, वन्यजीवों के कारण प्रदेश में हर साल में करीब 4745 बीघा खेत उजाड़ हो रहे हैं। इसके अलावा किसानों पर दोहरी मार वन महकमे से पड़ रही है। वन महकमे को करीब 92 करोड़ का मुआवजा किसानों और लोगों में बांटना है, जो बजट न होने के वितरित नहीं हो सका है।
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पहाड़ में खेती की भूमि कम है, उसके बाद काफी क्षेत्र असिंचित है। इसमें किसान जैसे-तैसे फसल को तैयार कर रहा है तो उसे वन्यजीव चट करने के साथ नुकसान पहुंचा रहे हैं। कमोबेश यही हाल तराई में भी है। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार 2012 से 2017 मार्च के बीच हाथी, सूअर, बंदर से लेकर हाथियों ने भारी नुकसान पहुंचाया है। इन पांच सालों में वन्यजीवों ने 1483 हेक्टेयर खेत(4745 बीघा) खेतों को उजाड़ दिया। यही नहीं हाथियों ने 196 घरों को भी ध्वस्त कर दिया। इसमें वन चौकियां शामिल नहीं है, जहां अक्सर हाथी हमला बोलते हैं।

यह वह आंकड़े हैं, जिसके लिए लोगों ने मुआवजे की मांग की है। यह संख्या कई गुना और भी हो सकती है, जिसमें किसानों ने मुआवजे के लिए सरकारी व्यवस्था के चक्कर में पड़ने की जगह दिल पर पत्थर रख लिया है। हालत यह है कि जिन्होंने मुआवजा के लिए मांग की है, उन सैकड़ों लोगों को राहत मिलने का इंतजार है।
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वन विभाग को करीब 92 करोड़ की मुआवजे की देनदारी है। प्रमुख वन संरक्षक वित्त एवं नियोजन गंभीर सिंह कहते हैं कि हर साल 60 लाख तक मुआवजा दिया जाता है। विभाग के पास बजट न होने के कारण वितरण नहीं हो सकता है। मुआवजा बांटने के लिए  डीएफओ स्तर पर कोष बनाया गया है, उसमें हर हाल में 20 लाख होना चाहिए। यह राशि भी कम है। जैसे ही शासन से बजट मिलता है, तत्काल प्रभावित पक्ष को मदद पहुंचाई जाएगी।

पशुधन को भी नुकसान
वन्यजीव खेतों को उजाड़ने के साथ किसानों के पशुधन को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। 2012 से 2017 मार्च तक 24,434 गाय, बकरी आदि पशुओं को मार दिया है। इसमें भी बड़ी संख्या में किसान होते हैं, जो तमाम सरकारी प्रक्रियाओं के कारण मुआवजे के लिए आवेदन नहीं करते हैं। खेती और पशुओं के नुकसान के कारण पहाड़ से लोगों का खेती को लेकर मोह भंग हो रहा है, पलायन बढ़ने का भी यह एक कारण है।
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