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उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग ने पूछा बिजली दर बढ़ाने का कारण

Thu, 14 Jan 2016 02:55 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
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विद्युत दरों की बढ़ोत्तरी पर उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग ने यूपीसीएल से जवाब मांगा है। आयोग ने उपभोक्ताओं पर एकदम 24 प्रतिशत वृद्धि के बोझ डालने के औचित्य पर सवाल उठाए हैं।
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उत्तराखंड पावर कारपोरेशन लिमिटेड (यूपीसीएल) ने वित्त वर्ष 2016-17 के लिए विद्युत दरों में बढ़ोतरी का प्रस्ताव आयोग को भेजा है। अमूमन अप्रैल महीने में आयोग नए टैरिफ को लागू कराता है। बुधवार को आयोग कार्यालय में हुई बैठक में आयोग ने बिजली दरें बढ़ाने के यूपीसीएल अधिकारियों के एक-एक प्रस्ताव का आधार जानने की कोशिश की।

प्रस्तावित टैरिफ में यूपीसीएल ने बिजली के बिल में करीब 24 प्रतिशत तक की वृद्धि किए जाने की पैरवी की है। जिसमें यूपीसीएल ने पीक आवर में ओपन मार्केट में बिजली महंगी होने, नए सब स्टेशनों के निर्माण, उच्च गुणवत्ता की विद्युत लाइनें और ट्रांसफार्मर आदि लगाने समेत विभिन्न सुविधाएं बढ़ाए जाने जैसे कई तर्क दिए हैं। लेकिन, यूपीसीएल का मत है कि सुविधाओं में लगातार विस्तार और खर्च बढ़ने के साथ-साथ विद्युत दरों को कम से कम 24 प्रतिशत तक बढ़ाया जाना तर्कसंगत लगता है।
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आयोग का मानना है कि तय समय में कार्य पूरा होने, लाइन लॉस कम करने, बिजली चोरी पर अंकुश लगाने और लांग टर्म करार से सस्ती बिजली खरीदने जैसे प्रयासों से यूपीसीएल अपने आय और खर्च में संतुलन कर सकता है।

उपभोक्ताओं पर एक साथ इतना आर्थिक बोझ डालना उचित नहीं है। आयोग के चेयरमैन सुभाष कुमार ने बताया कि अभी सिर्फ ऊर्जा निगमों के टैरिफ में प्रस्तावित बढ़ोतरी पर तर्क मांगे जा रहे हैं। टैरिफ फाइनल करने से पहले प्रदेश भर के आम उपभोक्ताओं से शिविर लगाकर खुली जनसुनवाई और वेबसाइट पर राय ली जाएगी।

यूपीसीएल ने जीता 27.59 करोड़ रुपये का टैरिफ विवाद
सुप्रीम कोर्ट ने 27.59 करोड़ रुपये के 12 साल पुराने टैरिफ विवाद में यूपीसीएल के पक्ष में निर्णय दिया है। मंगलवार को हुए निर्णय की प्रति बुधवार को यूपीसीएल (उत्तराखंड पावर कारपोरेशन लिमिटेड) प्रबंधन को प्राप्त हो गई है।

यूपीसीएल प्रबंधन की ओर से जारी विज्ञप्ति के मुताबिक, मैसर्स जय प्रकाश (जेपी) इंडस्ट्रीज द्वारा गोपेश्वर में हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट के निर्माण के लिए समय-समय पर अस्थायी विद्युत संयोजनों के लिए कारपोरेशन के साथ अनुबंध किया गया था। इस पर लागू विद्युत दरों के अनुसार विद्युत बिल भेजे गए।

टैरिफ गलत ठहराते हुए वर्ष 2003 में भेजे विद्युत वसूली नोटिसों को जेपी इंडस्ट्रीज ने जिला न्यायालय गोपेश्वर में वाद दायर कर निरस्तीकरण की मांग की। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर न्यायिक मध्यस्थ की नियुक्ति की गई। वर्ष 2012 में न्यायिक मध्यस्थ ने यूपीसीएल द्वारा लागू टैरिफ को निरस्त करते हुए जेपी इंडस्ट्रीज के पक्ष में आदेश दिए।

जिसे जिला न्यायालय गोपेश्वर ने भी सही ठहराया। यूपीसीएल ने इस निर्णय को नैनीताल हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट के आदेश पर यूपीसीएल ने अक्तूबर 2015 में जेपी इंडस्ट्रीज को 27.59 करोड़ रुपये की वसूली का नोटिस दिया।

जेपी इंडस्ट्रीज ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने यूपीसीएल के पक्ष में निर्णय दिया। यूपीसीएल प्रवक्ता मधुसूदन ने बताया कि प्रबंधन ने इस बड़ी उपलब्धि के लिए कारपोरेशन के लीगल सेल की टीम और इस कार्य में लगे बाकी कर्मियों को बधाई दी है।
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