राजधानी देहरादून में विधानसभा के पास मोबाइल टॉवर से अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे संविदा कर्मी नीचे उतर आए हैं। सोमवार देर शाम मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से बातचीत के आश्वासन के बाद ये कर्मी नीचे उतरने को तैयार हो गए।
शुक्रवार की रात से 4 विद्युत संविदाकर्मी अपनी मांगों को लेकर टॉवर पर चढ़े थे। इसके बाद इनके समर्थन में सैकडों कर्मचारी नीचे बैठकर सरकार का विरोध कर रहे थे।
यही नहीं इनके समर्थन में नीचे विरोध कर रहे साथी कर्मचारियों में चार लोगों ने मांगें न पूरी होने तक आमरण अनशन करने का फैसला किया है। इनका गुस्सा इस बात पर भी बढ़ गया जब इन्हें टॉवर पर चढ़े साथियों को खाना नहीं देने दिया गया।
आमरण अनशन करने वाले कर्मचारियों के नाम-
राम जीवन
अनिल जगूड़ी
पूरन रावत
जगदीश सिंह
इससे पहले रविवार को पुलिस के साथ इन लोगों की झड़प हो गई जब ये कर्मचारी टॉवर पर चढ़े अपने साथियों के लिए पानी की बोतल ले जा रहे थे। उसी समय पुलिसवालों ने इनको दौड़ा लिया।
दीपावली से एक दिन पहले शनिवार को सुबह पांच बजे से चार विद्युत संविदा कर्मी विधानसभा के पास स्थित एक टॉवर पर चढ़े हुए हैं।
टॉवर पर चढ़ने वाले
कंचन जोशी
रणधीर पुंडीर
दर्शन भंडारी
कोस्तुरबा नंद पांडे
इसमें से रणधीर पुंडीर घायल है। उसे दिन में तेज बुखार भी था। पूरे दिन सभी चार संविदा कर्मी भूखे रहे। ये सभी अपने साथ खाने पीने के लिए कोई भी समान लेकर नहीं टॉवर पर नहीं चढ़े हैं।
वार्ता करने के लिए कोई नहीं पहुंचा
संविदा कर्मियों के आंदोलन को धार देने के लिए भाजपा नेता रवींद्र जुगरान, यूकेडी के नेता शांति प्रसाद भट्ट और लताफत हुसैन मौके पर पहुंच गए। दिन भर टॉवर के नीचे संविदा कर्मी जमे रहे।
सरकार, साकेत और ऊर्जा क्षेत्र के तीनों निगम प्रबंधकों के खिलाफ नारेबाजी होती रही। सरकार की ओर से वार्ता करने के लिए कोई नहीं पहुंचा। इससे संविदा कर्मियों में और आक्रोश था। उनका कहना था कि संविदा विद्युत कर्मियों की उपेक्षा आगामी लोकसभा चुनाव में प्रदेश सरकार को भुगतने के लिए तैयार रहना होगा।
खुद पर डाला पेट्रोल
एक विद्युत संविदा कर्मी शाम को साढ़े पांच बजे अचानक अपने ऊपर पेट्रोल डाल दिया। इससे धरना में बैठे संविदा विद्युत कर्मियों में हड़कंप मच गया। संविदा कर्मी और पुलिस के बीच बचाव के कारण वह आग लगा पाने में सफल नहीं हो पाया।
संविदाकर्मियों की मांग
14 मार्च को हुए त्रिपक्षीय समझौते में संविदा कर्मियों की मांग तीन माह में पूरी करने की सहमति दी थी, लेकिन आठ माह बाद भी कार्रवाई नहीं हुई है।