खेती किसानी भले ही उत्तराखंड के लिए बड़ा सवाल हो पर चुनाव के मैदान में खम ठोक रहे राजनीतिक दलों का शायद इससे कोई वास्ता नहीं।
उलझकर रह गई है ये सीट
पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खंडूड़ी के कारण हॉट सीट बने पौड़ी गढ़वाल संसदीय क्षेत्र से हालांकि खुद कृषि मंत्री हरक सिंह रावत भी मैदान में हैं।
पर खेती किसानी के मुद्दों की बजाय फिलहाल यह सीट सतपाल महाराज के भाजपा में जाने और टीपीएस के कांग्रेस में आने के समीकरण में उलझकर रह गई है।
चुनाव में खम ठोक रहे नेताओं को शायद अभी यह याद नहीं आया है कि गढ़वाल संसदीय सीट का पौड़ी देश के उन दो जिलों में शामिल है जहां पिछले दस साल में जनसंख्या का ग्राफ बढ़ने की बजाय घटा है।
पौड़ी में कम हो रही जनसंख्या वृद्धि दर
जहां पूरे देश में हर जगह दस सालों में जनसंख्या की वृद्धि दर बढ़ी है, वहीं पौड़ी में यह कम हो रही है। पलायन की दर इस सीट पर अधिक है। दूसरी ओर, आपदा प्रभावित केदारघाटी, बदरीनाथ, हेमकुंड साहिब भी इसी सीट का हिस्सा हैं।
यही संसदीय सीट है जहां 24 से अधिक जल विद्युत परियोजनाएं जून 2013 की आपदा में पूरी तरह से बरबाद हो गईं। इसी सीट पर आपदा ने प्रदेश को पर्यटन हब बनाने का मंसूबा पूरी तरह से ध्वस्त किया।
हाल ये है कि अब तक इस मामले में कोई ठोस कदम नहीं बढ़ पाया है। जाहिर है कि इस संसदीय सीट के जनप्रतिनिधियों को इन सब मामलों पर स्पष्ट राय भी जाहिर करनी होगी।
मौसम बदलाव से प्रभावित हो रहा क्षेत्र
आपदाओं के लिहाज से गढ़वाल संसदीय सीट प्रदेश में सबसे अधिक प्रभावित है। चमोली जिला एक तरह से तिब्बती पठार का विस्तार है और यह क्षेत्र अब तेजी से मौसम बदलाव से प्रभावित हो रहा है।
इन समस्याओं पर अब तक इस सीट के चुनाव में कोई बात ही नहीं हुई है। ऐसे में संभावना है कि हरक सिंह को ये बताना होगा कि कृषि मंत्री रहते हुए उन्होंने क्या किया और खंडूड़ी से भी मतदाता पूछ सकते हैं कि उनके मुख्यमंत्री रहते हुए क्षेत्र के लिए क्या कुछ हुआ।
कैसे लुभाएंगे मतदाताओं को
पिछली बरसात में हरिद्वार के लगभग 40 गांवों के ग्रामीणों की सांसें ऊपर-नीचे होती रहीं, यह सोचकर कि पता नहीं कब गंगा उफान पर आ जाए।
पतित पावनी गंगा के उफान के डर से ग्रामीणों ने दर्जनों रातें जागकर काटीं, हर समय घरबार गंगा की लहरों में समाने का डर बना रहा।
खेतीबाड़ी तबाह हुई, सरकार और जनप्रतिनिधियों ने बाढ़ से गांवों को बचाने के लिए गंगा पर तटबंध बनाने का भरोसा दिया, लेकिन कुछ नहीं हुआ। लोकसभा चुनाव में इन गांवों के लोगों की नाराजगी सामने आ सकती है।
निशंक ने भी पूरी नहीं की उम्मीद
क्योंकि हरिद्वार से भाजपा प्रत्याशी डा. रमेश पोखरियाल निशंक मैदान में हैं, वह भी दो साल से ज्यादा वक्त तक सीएम रहे, उनसे भी उम्मीद पूरी नहीं हुई।
कांग्रेस से सीएम हरीश रावत की पत्नी रेणुका रावत मैदान में हैं, हरीश अभी मुख्यमंत्री हैं और सिटिंग एमपी के साथ ही केंद्रीय जल संसाधन मंत्री रहने के दौरान भी इस बीमारी का कोई हल नहीं खोज सके थे।
चूंकि हरीश इस समय मुख्यमंत्री हैं और जनता की नाराजगी सरकार से ज्यादा होती है। ऐसे में रही सही कसर जिला प्रशासन ने पूरी कर दी।
आपदा को लेकर बैंक के कर्ज की वसूली सरकार ने स्थगित की थी लेकिन जिला प्रशासन ने किसानों की आरसी (रिकवरी सर्टिफिकेट) काटकर जख्मों को और कुरेदने का काम कर दिया। दर्द के बाद दवा देने के बजाय बीमारी को बढ़ा दिया।
खुलासा हुआ तो हड़कंप मच गया
सैकड़ों किसानों के फसली ऋण व अन्य तरह के बैंक बकाये के खिलाफ तहसील से जारी की गई आरसी का जब खुलासा हुआ तो हड़कंप मच गया। आरसी वापस तो नहीं की गई, लेकिन फिलहाल वसूली पर रोक लगानी पड़ी।
बाढ़ में बह गई कृषि भूमि और 18 हजार हेक्टेयर में नष्ट हुई गन्ने की फसल का मुआवजा किसानों को देने का ड्रामा तो बहुत हुआ लेकिन अभी भी जिला मुख्यालय व तहसील के चक्कर काटते ऐसे सैकड़ों किसान मिल जाते हैं जिन्हें मुआवजे का आसरा है।
हरिद्वार जनपद में गंगा खादर में बाढ़ से प्रभावित गांव
गंगदासपुर, सौपरी, पंडितपुरी, महाराजपुर, रणजीतपुर, जसपुर, डुमनपुरी, कलसिया, बालावाली, गिद्दावाली, शेरपुरबेला, माडाबेला, नाईवाला, चंद्रपुरी, दल्लेवाला, मथाना, राजपुर, हस्तमौली, आलमपुरा, इदरीशपुर, तुगलपुर, नंदपुर, पीठापुरी, बहादराबाद, मखियाली समेत लगभग चालीस गांव।