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दुश्वारियों के बीच जी रहे लोग वोट से नेताजी पर करेंगे चोट

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सोमवार सुबह करीब 10 बजे अमर उजाला टीम कार्लीगाड़ गांव पहुंची। रास्ता खराब होने के कारण बाइक गांव से करीब ढाई किलोमीटर पहले छोड़नी पड़ी।
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यहीं से शुरू हो गई गांव के लोगों की दुश्वारियों की कहानी। गांव से करीब चार किलोमीटर पहले सहस्त्रधारा पर्यटन स्थल पड़ता है।

गांव की तरफ बढ़ते हुए सहस्त्रधारा में कई सैलानियों को पानी में अठखेलियां करते देखा।

गांव की ओर बढ़ते हुए सोचा था कि यहां भी नेताओं के पोस्टर, बैनर और झंडे लगे होंगे। लेकिन गांव में ऐसा कोई निशान नजर नहीं आया।

अब तक कोई नेता प्रचार के लिए नहीं आया

मालूम चला कि मसूरी विधानसभा क्षेत्र के टिहरी लोकसभा सीट में आने वाले इस गांव में अब तक कोई नेता प्रचार के लिए नहीं आया है।

गांव पहुंचे तो खेतों में महिलाएं गेहूं काटने में जुटी थीं। परिचय हुआ तो पता चला कि गांव की निवर्तमान प्रधान मुन्नी देवी भी खेत में काम कर रही हैं।

बातचीत शुरू की तो मुन्नी देवी ने नदी के किनारे जमा ऊंचे बोल्डरों और मलबे की ओर इशारा करते हुए बताया कि कभी वहां हमारे खेत होते थे। बता दें कि कार्लीगाड़ गांव में 22 अगस्त 2011 को कुदरत ने कहर बरपाया था।

उस रात फटे बादल ने गांव के रास्ते, स्कूल, पंचायत घर, पुल और खेत तबाह कर दिए थे। पांच ग्रामीणों की मौत भी हो गई थी।

चुनाव पर चर्चा की कोशिश की तो मुन्नी देवी बोलीं कि हमें तो सिर्फ परिवार की रोजी-रोटी की चिंता है।

सरकारी बेरुखी ने किया बर्बादा

गांव में कुछ आगे बढ़े तो खंडहर में तब्दील होते घरों ने शिकायत कर दी कि सरकारी बेरुखी ने राजधानी के नजदीक होने के बावजूद गांव को पलायन की जद में ला दिया है।

कुछ ग्रामीणों से बात की तो साफ हुआ कि टूटे पुल, बंजर खेत और ऊबड़-खाबड़ रास्तों को लोग अपनी नियति मान चुके हैं। ग्रामीण कहते हैं कि नेता आएंगे तो झूठे वादे ही करेंगे।

इससे अच्छा है कि वह आए ही न। कम से कम उम्मीद के टूटने का तो दर्द नहीं झेलना पड़ेगा। नेताओं की बेरुखी के बावजूद गांव के लोगों की आस्था लोकतंत्र में है।

गांव वाले कहते हैं कि चुनाव के दिन ईवीएम का बटन दबाने के लिए वह गांव से करीब पांच किमी दूर बने पोलिंग बूथ पर जरूर जाएंगे।

गांव वालों की मुख्य परेशानी

- गांव में कोई बीमार हो तो एंबुलेंस करीब दो किमी दूर मुख्य सड़क तक आती है। संकरे-कच्चे रास्ते पर मरीजों को बाइक या दूसरे माध्यमों से एंबुलेंस तक पहुंचाया जाता है।

- गैस सिलेंडर के लिए बुकिंग के बाद एक महीने तक इंतजार करना पड़ता है, उस पर भी 450 रुपए के सिलेंडर को गांव तक पहुंचाने के लिए 600-700 रुपए चुकाने पड़ते हैं।

- गांव के नन्हे बच्चे हर रोज ऊबड़-खाबड़ और पथरीले रास्ते पर 3 से 5 किलोमीटर की पैदल यात्रा के बाद स्कूल पहुंचते हैं।

कार्लीगाड़ ग्रामसभा
गांव- कार्लीगाड़, मझाड़ा, बगड़ा धोरण, वसुधारा, दयाड़ा
आबादी- 1200
वोटर- 470
ग्राम प्रधान- मुन्नी देवी (निवर्तमान)
पोलिंग बूथ- प्राइमरी स्कूल, बगड़ा धोरण (ग्रामसभा के अलग-अलग गांवों से दूरी 3 से 5 किलोमीटर)

14 परिवारों का पुनर्वास कब

कार्लीगाड़ गांव के अति प्रभावित 14 परिवारों का पुनर्वास करने का आदेश शासन ने दिया था। जिलाधिकारी ने शासन को रिपोर्ट भी भेजी थी।

वहीं भूतल एवं खनिज इकाई के वैज्ञानिकों ने इस क्षेत्र की जांच कर 30 मई 2011 को पुनर्वास करने की रिपोर्ट दी थी। जिस क्षेत्र में पुनर्र्वास किया जाना है, वहां की भी रिपोर्ट भेजी गई, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।

बैंक भी मांग रहे अपनी रकम
पूर्व प्रधान रतन सिंह नेगी बताते हैं कि गांव के लोगों की रोजी का मुख्य जरिया अदरक और प्याज की खेती है। आपदा में कई खेत बह गए तो कई मलबे में दब गए।

35 लोगों ने बैंक से लोन लेकर खेती की थी, खेत बहने के बाद उन पर संकट खड़ा हो गया है। तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने प्रभावित लोगों का लोन माफ करने की बात कही थी।

दो साल तक तो बैंक चुप्पी साधे रहे, अब लोन की रकम चुकाने का दबाव बनाया जा रहा है।
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पुल, स्कूल कब बनेंगे

वर्ष 2011 में आए सैलाब में गांव को जोड़ने वाला पुल बह गया था, जो आज तक नहीं बन सका है।

बच्चे, बड़ों और बूढ़ों को गधेरे में बहते पानी से होकर गुजरते हुए रास्ता पार करना पड़ता है। वित्तीय सत्र 2013-14 में पुल स्वीकृत हुआ था, लेकिन इसके एक ओर गहरा गड्ढा खुदा है तो दूसरी ओर पत्थरों का ढेर लगा है।

एप्रोच रोड नहीं बनी है। गांव का एकमात्र प्राइमरी स्कूल भी बह गया था, जिस कारण बच्चों को तीन किलोमीटर दूर पढ़ने के लिए जाना पड़ता है।

पूर्व प्रधान छोड़ चुके घर
गांव के पूर्व प्रधान रतन सिंह आपदा के बाद अपना पुश्तैनी मकान छोड़ चुके हैं। बताया कि 22 अगस्त 2011 की रात पहाड़ी से भारी मलबा और पानी उनके घर के ऊपर से होकर निकला था।

हालांकि, इससे घर को अधिक नुकसान नहीं हुआ, लेकिन भविष्य के खतरे को देखते हुए परिवार ने इसे छोड़ने का फैसला किया। रतन अब नदी के दूसरी ओर नया मकान बना चुके हैं।
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