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शिक्षा में बड़े बदलाव पर आरएसएस की नजर

Sat, 29 Nov 2014 10:07 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, हरिद्वार
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आरएसएस के सर संघ चालक मोहन भागवत ने कहा कि वर्तमान शिक्षा पद्धति से दुनिया में कोई देश संतुष्ट नहीं है। पेट भरने की शिक्षा से पूरी दुनिया अब ऊब चुकी है। अब सच्चा मनुष्य बनाने वाली शिक्षा की जरूरत है। उन्होंने कहा कि विदेशी भाषा और संस्थाओं से सहयोग लेने में कोई बुराई नहीं है।
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शनिवार को पतंजलि योगपीठ फेज-2 में आयोजित आरएसएस के नवसृजन शिविर में शिक्षकों से संवाद में भागवत ने कहा कि मौजूदा शिक्षा मानवीय संवेदनाओं को पीछे छोड़ रही है।

आज ऐसी शिक्षा पद्धति की जरूत है, जिसमें अच्छा और सच्चा मनुष्य बनाने की प्रेरणा व राष्ट्र का जिम्मेदार नागरिक होने का अहसास हो। इसके साथ ही शिक्षा को सुलभ और सस्ती बनाया जाना चाहिए।
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नई पीढ़ी को शिक्षा दान और दया के रूप में नहीं बल्कि अधिकार के तौर पर देनी होगी। भागवत ने कहा कि सरकार शिक्षा में सुधार करें या न करे, संघ स्वयंसेवक इसके लिए कार्य कर सकते हैं।
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भाषण से नहीं आचरण से बनेगा देश

मोहन भागवत ने कहा कि देश को वैभवशाली बनाने के लिए युवाओं में तरुणाई ऊर्जा का होना बहुत जरूरी है। समाज में फैली द्वेष की भावना को देखकर भी जिस युवा की नींद हराम नहीं होती है वह तरुण कहलाने का भी हकदार नहीं है। राष्ट्र को वैभवशाली बनाने के लिए भाषण की बजाय आचरण करके दिखाना होगा।

पतंजलि योगपीठ में चल रहे आरएसएस के प्रांतीय नव सृजन शिविर के दूसरे दिन मोहन भागवत ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि ‘तरुण’ का अर्थ उम्र से नहीं बल्कि जोश से है। युवा जोश में होश न खोएं इसके लिए स्व नियंत्रण का अभ्यास करना जरूरी है। मनुष्य होने के नाते जोश पर नियंत्रण होना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि जीवन की एक दिशा होती है। जिस तरह तीर टेढ़ा होते ही लक्ष्य से भटक जाता है। उसी तरह से तरुणाई की ऊर्जा भटकने पर समाप्त हो जाती है।

मोदी से संयम सीखें युवा
शिविर के दूसरे दिन सामूहिक सत्र को संबोधित करते हुए भागवत ने मोदी की अमेरिका यात्रा का उदाहरण युवाओं से सामने रखा। कहा कि मोदी ने पूरा अमेरिका घूमा लेकिन नवरात्र का व्रत जारी रखा। यह संयम का सबसे बड़ा उदाहरण है। उन्होंने कहा कि स्वयंसेवक का अर्थ ही जीवनभर परिश्रम करना और इसको बनाए रखने की सत्त साधना करना होता है।
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