अनु, निशा और नीरू तीनों का दर्द एक ही था गुरबत। आर्थिक कमजोरी, उस पर ज्यादा पढ़ा-लिखा न होना। वे कोई रोजगार तलाशने की कोशिश करतीं तो नाकामी ही हाथ आती थी।
हाथों में कोई खास हुनर भी नहीं, सिवाय इसके कि चूल्हा-चौका करना इनकी नियति और शौक भी था। पति-बच्चों के लिए रोटियां बेलते-बेलते इन महिलाओं ने कुछ करने की ठान ली और रोटियों को ही परिवार की रोजी-रोटी का जरिया बना लिया।
आज देहरादून की शादियों में खुड़बुड़ा मोहल्ले की रहने वाली ये महिलाएं अपना स्टाल सजाती हैं। वहां इनकी बनाई नर्म, गर्म रोटियां मेहमानों की जुबानों में घुलती हैं तो तारीफों के पुल बंधने शुरू हो जाते हैं।
अनु 44 वर्ष की हैं। पहले घर का गुजारा पति की कमाई से चलता था। कुछ समय पूर्व उनकी तबीयत खराब रहने लगी। काम छूट गया, उस पर इलाज का खर्चा बढ़ता गया। खाना बनाने का शौक था। अनु ने शादियों में रोटी बनाना शुरू किया, मोहल्ले की और महिलाओं को भी साथ जोड़ा।
49 वर्षीय निशा के पति बेरोजगार हैं। कमाई का कोई जरिया न होने से परिवार के पालन की जिम्मेदारी उन पर ही है। रोजगार का कोई ठिकाना था नहीं। एक काम ही सबसे अच्छा आता था, खाना बनाना, तो इसे ही रोजी से जोड़ लिया। बच्चों ने भी साथ दिया और काम चल निकला।
47 वर्षीय नीरू बताती हैं कि परिवार की माली हालत अच्छी नहीं थी। कागज के लिफाफे बनाकर दुकानों में देती थीं, लेकिन इससे गुजारा चलाना मुश्किल था। अब शादियों के सीजन में स्टालों पर रोटियां बनाकर अच्छी रोजी जुट जाती है। हालांकि, बाकी समय लिफाफे अब भी बनाती हैं।