मृतक जवान का शव सेना के हेलीकॉप्टर से लाया गया
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कुमाऊं स्काउट के नायक नारायण सिंह का पार्थिव शरीर जैसे ही उनके पैतृक आवास पहुंचा पूरा माहौल गमगीन हो गया। पत्नी दीपा नारायण सिंह के शव से लिपटकर दहाड़ें मारकर रो पड़ीं। परिवार वालों के लिए यह 13 दिन का इंतजार नहीं, 13 युगों का इंतजार जैसा था। बूढ़े माता-पिता तीनों बच्चे, मनीषा, रेनू और नैतिक भी फूट-फूट कर रो पड़े। बेटी मनीषा तो बेहोश ही हो गई।
इस परिवार ने 16 मई के बाद का समय आंखों ही आंखों में काटा। 16 मई को ही कुमाऊं स्काउट में नायक नारायण सिंह की नेपाल के मकालू पर्वत में सेना के पर्वतारोहण अभियान के दौरान बर्फ से दबकर मौत हो गई थी। मौसम खराब होने से उनका पार्थिव शरीर शीघ्र भारत नहीं लाया जा सका। ऐसे में नारायण सिंह के परिवार, गांव के लोगों को एक-एक दिन इंतजार में काटने पड़े। मकालू में हुए हादसे से गांव में सबकुछ ठहर सा गया था।
अनिश्चय का यह समय इन सबने बेजारी से काटा। एक कौर भी गले से नीचे नहीं उतरा तो नारायण सिंह की पत्नी दीपा, मां मोतिमा देवी को चिकित्सकों ने ग्लूकोज चढ़ा कर बचाया। नारायण सिंह के अंतिम दर्शनों के लिए पूरा गोरी छाल क्षेत्र उमड़ पड़ा। सीलिंग के प्रधान दीवानी राम, सेरा के प्रधान नंदन सिंह, सिर्खा के देवीदत्त उपाध्याय सहित तमाम पंचायत प्रतिनिधि बरम पहुंचे। नारायण सिंह की चिता को उनके भाई देवसिंह ने मुखाग्नि दी। जवान को अंतिम विदाई देने के लिए धारचूला के एसडीएम के घाट नहीं आने पर धारचूला के विधायक हरीश धामी ने नाराजगी जताई।
400 मीटर की दूरी को तय करने के लिए लगाया डेढ़ किमी का फेरा
नेपाल की मकालू चोटी के आरोहण के दौरान जान गंवाने वाले कुमाऊं स्काउट के जवान नारायण सिंह की अंतिम यात्रा भी दो साल पहले मिले गहरे जख्मों को कुरेद गई। जवान के पार्थिव शरीर को 400 मीटर दूर घाट तक ले जाने के लिए करीब डेढ़ किलोमीटर की दूरी तय की गई। कारण, दो साल पहले आई आपदा में यह 400 मीटर मार्ग क्षतिग्रस्त हो गया था और तब से सुधारा ही नहीं गया।
पर्वतारोही नारायण सिंह का अंतिम संस्कार स्थानीय घाट में किया गया। बरम गांव से घाट की दूरी मात्र करीब 400 मीटर है। लेकिन शवयात्रा डेढ़ किलोमीटर घुमाकर घाट तक गई। दो वर्ष पूर्व आई भीषण आपदा में घाट को जाने वाला संपर्क मार्ग ध्वस्त होने के कारण गांव वालों को ऐसा करना पड़ा। इन दो सालों में बरम तो आपदा से तो उबर आया था लेकिन दो साल बाद नारायण सिंह के असमय निधन के रूप में मिले जख्म की पीड़ा को रास्ते की इस दुश्वारी ने और बढ़ा दिया। गांव वालों के अनुसार इन दो सालों में भी शासन-प्रशासन ने रास्ता सुधारने की सुध नहीं ली, यह अफसोस जनक है।