अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश नंदन सिंह की अदालत ने शनिवार को दहेज उत्पीड़न, मारपीट और जबरन गर्भपात कराने के मामले में पति और ननद को दोषमुक्त कर दिया। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा, जिसके चलते दोनों को संदेह का लाभ देते हुए बरी किया गया।
सहसपुर थाने में 25 जनवरी 2018 को मनीषा अंसारी ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी। उनका आरोप था कि चार अप्रैल 2016 को हरबर्टपुर निवासी यूसुफ अली से निकाह के बाद ससुराल पक्ष दहेज में बाइक मिलने से नाराज था और कार की मांग कर रहा था। मनीषा का आरोप था कि सात अक्तूबर 2016 को उन्हें दवाइयां खिलाकर जबरन गर्भपात कराया गया और मारपीट कर 23 अक्तूबर को घर से निकाल दिया गया। पुलिस ने यूसुफ और उसकी बहन जुबेदा बेगम (निवासी निचली भगानी, पांवटा साहिब, हिमाचल) के खिलाफ दहेज प्रतिषेध अधिनियम व अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज किया था।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि पूर्व में दहेज मांग की कोई शिकायत नहीं की गई थी। पीड़िता के पिता अली हसन और भाई बिलावल हक के बयानों में भी कार मांगने को लेकर विरोधाभास मिला। महत्वपूर्ण तथ्य यह सामने आया कि पति यूसुफ ने 2017 में तलाक का मुकदमा दायर किया था। इसका नोटिस मिलने के बाद ही पत्नी ने यह मुकदमा दर्ज कराया था। मारपीट का कोई स्वतंत्र गवाह भी नहीं मिला।
वहीं, जबरन गर्भपात के आरोप पर चिकित्सक डॉ. सुधी गुप्ता और लैब टेक्नीशियन रामकिशन ने ऐसा कोई बयान नहीं दिया, जिससे दवाइयों से गर्भपात सिद्ध हो सके। न ही अल्ट्रासाउंड या इलाज का कोई दस्तावेज उपलब्ध कराया गया। अभियोजन पक्ष के आठ गवाहों के पेश होने के बावजूद आरोप साबित न होने पर अदालत ने दोनों आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया।