इसी बीच एक जूनियर डॉक्टर पहुंचे। उन्होंने डॉ. कालरा (चाइल्ड स्पेशलिस्ट) को फोन किया। अनिल का आरोप है कि डॉक्टर ने फोन पर ही कह दिया कि ‘अस्पताल में वेंटिलेटर नहीं है, लिहाजा आप अपने बच्चे को कहीं और ले जाएं’। अनिल ने थोड़ा सवाल किया तो डॉ. कालरा ने दुत्कार दिया, ‘ कहने लगे, डीजी से पूछो, यहां वेंटिलेटर क्यों नहीं है’। इस संबंध में डॉ. कालरा का पक्ष लेने चाह, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो पाया।
स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली की तस्दीक वहां पहुंची 108 की एंबुलेंस ने भी की। नवजात को हायर सेंटर ले जाने के लिए उन्होंने 108 बुलाई तो एंबुलेंस के तकनीशियन बोले कि इसका सिलिंडर खराब है। लिहाजा वे बच्चे को नहीं ले जा सकते। करीब 30 मिनट बाद दूसरी एंबुलेंस मौके पर पहुंची। अनिल 40 मिनट तक नवजात को लेकर अस्पताल में खड़े रहे।
- सीएचसी रायपुर में बच्चे को देखने के लिए डॉक्टर को आना चाहिए था, लेकिन कोई नहीं पहुंचे।
- दून महिला अस्पताल में नियमों के अनुसार किसी भी नवजात के सीरियस होने पर डॉक्टर को अस्पताल पहुंचना था, लेकिन यहां भी डॉ. कालरा सिर्फ फोन पर ही बातें करते रहे।
- अस्पताल में संसाधनों की क्या स्थिति है। इसके बारे में परिजनों को स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए थी, लेकिन डॉक्टर ने फोन पर ही दुत्कार दिया।
अस्पताल में वेंटिलेटर है। यहां बच्चों के इलाज किए जाते हैं। डॉ. कालरा ने ऐसा क्यों कहा, इसकी जांच करेंगे। उनकी पहले भी शिकायतें आई हैं। सोमवार को पूरे मामले को देखा जाएगा।
-डॉ. आशुतोष सयाना, प्राचार्य दून मेडिकल कॉलेज
राजधानी में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का हाल किसी से छुपा नहीं है। कभी यहां मशीनें खराब रहती हैं तो कभी दवाएं नहीं मिलती। कोढ़ में खाज का काम डॉक्टरों का व्यवहार कर देता है। आए दिन डॉक्टरों के रवैये को लेकर सवाल उठते हैं? रविवार को डॉ. कालरा के रवैये ने लापरवाही और अमानवीयता की हद पार कर दी।
जबकि डॉक्टरों के व्यवहार में सुधार के लिए लगातार कार्यशालाएं आयोजित की जाती हैं। बावजूद इसके इनके व्यवहार सुधरने का नाम नहीं ले रहा है। ऐसे में कॉलेज प्राचार्य कुछ कार्रवाई करे तो व्यवहार में सुधार आने की उम्मीद की जा सकती है।