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ऊर्जा निगमकर्मियों और सरकार के बीच टकराव के आसार, कोई पीछे हटने को नहीं तैयार

Thu, 21 Dec 2017 10:12 AM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
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वेतनमान में संशोधन किए जाने से नाराज ऊर्जा निगमों के कर्मियों और उत्तराखंड सरकार के बीच टकराव के आसार बन गए हैं। दोनों ही पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं है।
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ऊर्जा कर्मियों ने पांच जनवरी से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने का एलान कर रखा है तो इससे निपटने के लिए सरकार ने भी वैकल्पिक व्यवस्था करनी शुरू कर दी है। ऐसे में तो यही लग रहा है कि राज्य गठन के बाद प्रदेश में पहली बार ऊर्जा निगमों के कर्मचारियों की हड़ताल हो सकती है। सरकार अपने स्टैंड को सही बता रही है तो उधर आंदोलितकर्मी भी अपनी मांग को न्यायोचित करार दे रहे हैं। अमर उजाला ने टकराव के इन हालातों की गहराई से पड़ताल की। प्रस्तुत है रिपोर्ट...

विवाद की जड़
पे-मैट्रिक्स और एसीपी में बदलाव किए जाने से शुरू हुआ विवाद
ऊर्जा निगमों के कर्मियों को सातवें वेतनमान का लाभ देने का जो शासनादेश (जीओ) 26 सितंबर को जारी किया, उसमें कर्मचारियों की वेतन तालिका (पे-मैट्रिक्स) और एसीपी (एश्योर्ड करियर प्लान) में बदलाव कर दिया गया। जीओ जारी होने के बाद से ही ऊर्जा निगमों के कर्मी इसको लेकर अपना विरोध जता रहे हैं। शासन स्तर पर हुई वार्ता के बाद अपर सचिव ऊर्जा रणवीर सिंह चौहान की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया गया था, जिसमें ऊर्जा निगमों के प्रबंधन निदेशकों और कर्मचारी संगठनों के पदाधिकारियों को शामिल किया गया था। कमेटी ने ऊर्जा कर्मियों के पे-मैट्रिक्स में बदलाव करने की सिफारिश की थी। उस आधार पर पे-मैट्रिक्स में कुछ बदलाव भी किया गया, लेकिन ऊर्जा निगमों के कर्मी इसे मानने को तैयार नहीं है। 
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पे-मैट्रिक्स और एसीपी में क्या किया गया है बदलाव 
राज्य गठन के बाद से ऊर्जा निगम के कर्मियों का ग्रेड वेतन राज्य कर्मियों के ग्रेड वेतन से अधिक है। यह व्यवस्था यूपी के जमाने से लागू है। ऊर्जाकर्मियों को जब छठवें वेतनमान का लाभ दिया गया था, उस वक्त भी इसमें कोई बदलाव नहीं किया गया था। सातवें वेतनमान को लागू करने के बाद इसमें बदलाव कर दिया गया है, जिसका विरोध ऊर्जा निगमों के कर्मी कर रहे हैं। 

पे मैट्रिक्स 
पुराना    नया
1900    1900
 2200    2200
2600    2400
3000    2800
4400    4200
6600    5400
11000    10000 
11500    10000
नोट:  ऊर्जा निगमों के कर्मियों को पहले 6600 के बाद अगला ग्रेड पे का वेतनमान 8900 रुपये का मिलता था। अब बीच में 7600 और 8700 का ग्रेड पे शामिल कर दिया है। इसी तरह 11000 और 11 500 के ग्रेड पे का वेतनमान 10000 रुपये निर्धारित किया गया है। 

एश्योर्ड करियर प्लान: 
ऊर्जा निगमों के कर्मियों को प्रमोशन नहीं मिलने की स्थिति में अगले वेतनमान का लाभ  9-14-19 साल पर दिए जाने की व्यवस्था थी। अब इसे बढ़ाकर 10-20-30 साल कर दिया गया है। ऊर्जा कर्मियों का कहना है कि यह व्यवस्था 1979 से चली आ रही है। इसका नुकसान यह होगा कि ऊर्जा कर्मियों को अगले वेतनमान का लाभ लेने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ेगा। कई कर्मचारी तो तीसरे एसीपी का लाभ लेने से पहले सेवानिवृत्त हो जाएंगे। ऊर्जा निगमों की संयुक्त संघर्ष कमेटी के प्रवक्ता दीपक बेनीवाल का कहना है कि अगर किसी को 40 साल मेें नौकरी मिलती है तो उसे मुश्किल से एक एसीपी का लाभ मिलेगा। 

ऊर्जा सचिव राधिका झा से पांच सवाल : 
ऊर्जा कर्मियों के पे-मैट्रिक्स और एसीपी में बदलाव क्यों किया गया? 
 सातवां वेतनमान लागू होने के बाद केंद्र के निर्देश पर पे-मैट्रिक्स और एसीपी में बदलाव किया गया है। इसका ऊर्जा कर्मियों को नुकसान नहीं होगा, क्योंकि पे-प्रोटेक्शन का लाभ दिया जाएगा। किसी भी ऊर्जा कर्मी का वेतन कम नहीं होगा। 

क्या इसमें बदलाव संभव नहीं है, क्योंकि यूपी में भी ऊर्जाकर्मियों के लिए पुरानी व्यवस्था लागू है ? 
देखिए! हर राज्य की अपनी अलग व्यवस्था होती है। अगर आप उत्तराखंड में नौकरी कर रहे हैं तो यूपी के मुताबिक वेतनमान संभव नहीं है। जहां तक बदलाव की बात है तो यह बातचीत से संभव है। हड़ताल से किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता है। 

ऊर्जाकर्मी तो कह रहे हैं कि शासन हठधर्मिता का रवैया अख्तियार किए हुए है ? 
ऐसा नहीं है, हम बातचीत के लिए हमेशा तैयार हैं। कई बार ऊर्जा निगमों की यूनियनों के पदाधिकारियों को बातचीत के लिए बुलाया गया, लेकिन वह नहीं आए। उनकी मांग को देखते हुए हम पे-मैट्रिक्स में 80 फीसदी तक बदलाव करने को तैयार हैं। इसका प्रस्ताव भी बन चुका है, लेकिन ऊर्जा कर्मी इसे मानने तो तैयार नहीं है। 

अब, इस मुद्दे पर शासन का क्या रुख है? 
 सरकार हर विसंगति को दूर करने को तैयार है। इसको लेकर मैंने कई बार वित्त सचिव से बात की है। हड़ताल की धमकी देकर अपनी बात नहीं मनवाई जा सकती है। उपभोक्ताओं को निर्बाध तरीके से बिजली की आपूर्ति मिले, यह भी तो सरकार की जिम्मेदारी है। 

हड़ताल की स्थिति में सरकार की क्या तैयारी है? 
हमारी हर संभव कोशिश होगी कि हड़ताल नहीं होने पाए। इसके बाद भी अगरऊर्जा कर्मी हड़ताल पर जाते हैं तो हमने वैकल्पिक व्यवस्था तैयार कर ली है। आईटीआई के 25 बच्चों को ज्वाइन कराया जा चुका है। शासन रिटायर्ड कर्मियों, उपनल कर्मियों और केंद्रीय ऊर्जा संस्थानों के संपर्क है। हड़ताल की स्थिति में इनकी मदद से बिजली की आपूर्ति निर्बाध तरीके से उपभोक्ताओं को प्रदान की जाएगी।

उत्तरांचल पावर इंजीनियर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष एमसी गुप्ता से पांच सवाल
 ऊर्जा निगमों के कर्मी किन मांगों को लेकर आंदोलनरत है? 
जवाब: सरकार ने ऊर्जा निगमों के कर्मियों को मिल रहे पे-मैट्रिक्स और एसीपी की व्यवस्था में बदलाव कर दिया है। सरकार पे-प्रोटेक्शन की बात कह रही है, लेकिन जो कर्मी नये भर्ती होंगे, उनको तो नुकसान होगा। 

अपनी मांग मनवाने का रास्ता हड़ताल ही है? 
हड़ताल तो हम भी नहीं करना चाहते हैं। शासन में बैठे कुछ अधिकारियों की हठधर्मिता की वजह से सारा मामला गड़बड़ हो रहा है। अधिकारियों ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया है और मुख्यमंत्री को भी पूरी जानकारी नहीं दे रहे हैं। 

कर्मचारियों की हड़ताल से आमलोगों को जो परेशानी होगी, उसके लिए कौन जिम्मेदार होगा? 
इसके लिए सीधे तौर पर शासन में बैठे अधिकारी जिम्मदार होंगे। हम तो पब्लिक को भी अपनी मजबूरी बता रहे हैं। शासन तो हमें खलनायक साबित करने पर तुला है। 
 
किन परिस्थितियों में हड़ताल को टाला जा सकता है
मुख्यमंत्री से वार्ता के बाद हड़ताल को टाला जा सकता है। हम मुख्यमंत्री से 15 मिनट का समय चाहते हैं। ऊर्जा निगमों की यूनियनों के पदाधिकारी उनको अपनी पूरी बात बताएंगे। हमें पूरी उम्मीद है हमारी बात सुनने के बाद मुख्यमंत्री निष्पक्ष तरीके से फैसला करेंगे और हड़ताल की स्थिति को टाला जा सकेगा।

मुख्यमंत्री से वार्ता करने में दिक्कत क्या आ रही है?
 दिक्कत तो कोई नहीं है, लेकिन हमें वार्ता के लिए मुख्यमंत्री के यहां बुलावा तो आए। हम तो अपनी बात कई मंत्रियों और विधायकों से भी कह चुके हैं। शासन में बैठे अधिकारी गलत बयानी कर रहे हैं कि हम बातचीत का बहिष्कार कर रहे हैं। हम वार्ता के लिए तैयार हैं। 

बातचीत से ही समस्या का समाधान निकल सकता है। आखिर हड़ताल पर जाने के बाद भी समझौता तो बातचीत के आधार पर ही होगा। इसलिए उनको काम करना चाहिए, बातचीत करनी चाहिए। आखिर उनकी भी कुछ जिम्मेदारी राज्य के प्रति है। सरकार को संकट में डालने का मतलब है राज्य की जनता को संकट में डालना। जितनी हमारी ड्यूटी है, उतनी उनकी भी ड्यूटी है। ऊर्जा कर्मी यह तय कर लें कि उनको यूपी की तर्ज पर वेतनमान चाहिए कि केंद्र की तर्ज पर, हम उनकी बात सुन लेंगे। 
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- त्रिवेंद्र सिंह रावत, मुख्यमंत्री
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