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मंत्री-नेता चुनाव में और अफसर ‘खेल’ में व्यस्त

Thu, 21 Dec 2017 10:05 AM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
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netaji - फोटो : डेमो
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रुसा के तहत 300 कंप्यूटरों की खरीद की तर्ज पर तत्कालीन मुख्य सचिव एस रामास्वामी ने भी अधीनस्थ अधिकारी के विरोध को नजरअंदाज करके साढ़े सात करोड़ रुपये से ज्यादा के कंप्यूटर-प्रिंटर आदि खरीदे थे। 300 कंप्यूटरों की खरीद में अनियमितता का मामला बुधवार को अमर उजाला ने उठाया तो यह एक नया मामला सामने आ गया।
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पता चला कि एक ओर जब राज्य के मंत्री-नेता और तमाम नौकरशाही विधानसभा चुनावों में व्यस्त थी, उसी समय राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (रूसा) के पैसों से करोड़ों के कंप्यूटरों की खरीद का गुपचुप कार्यक्रम चलता रहा। यह मामला पिछले साल दिसंबर और जनवरी के बीच का है। आनन-फानन में हुई इस खरीद के पीछे वित्तीय वर्ष की समाप्ति होने के चलते बजट समाप्त होने का हवाला दिया गया।

रूसा के तहत 28 शिक्षण संस्थानों के लिए सात करोड़ 83 लाख के कंप्यूटर और उससे जुड़ी अन्य सामग्री की खरीद के मामले में पंजाब की एक फर्म ने टेंडर की तमाम अजीबोगरीब शर्तों पर आपत्तियां उठाई थीं। फर्म ने जानबूझकर ऐसी शर्तें रखकर किसी फर्म विशेष को काम देने तक का आरोप लगा दिया। इस प्रकार के विवाद सामने आते देख तत्कालीन अपर सचिव डॉ. राघव लंगर ने रिटेंडर करने की बात फाइल पर लिख दी, मगर तत्कालीन प्रोजेक्ट डायरेक्टर और पूर्व मुख्य सचिव एस. रामास्वामी ने इस आपत्ति पर कुछ समय पूर्व कृषि विभाग में इसी तरह से खरीद की प्रक्रिया अपनाए जाने का हवाला देते हुए इसे खारिज कर दिया था।
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इस खरीद की शुरूआत 26 दिसंबर को चुनावी बेला में हुई थी। इसमें कंप्यूटर, प्रिंटर व अन्य सामग्री शामिल की गई। केंद्र सरकार के स्पष्ट निर्देश हैं कि सरकारी खरीद में गवर्मेंट ई-पोर्टल (जेम) का उपयोग किया जाए। बावजूद इसके ई-टेंडर जारी किया गया। 29 दिसंबर को जारी ई-टेंडर में हैरान करने वाली बात यह रही कि इसमें प्री-ब्रिड प्रक्रिया का प्रावधान ही नहीं किया गया, जबकि बड़े टेंडर और खासकर तकनीकी उपकरणों की खरीद में यह अनिवार्य है। प्री-बिड प्रक्रिया में उन फर्मों को बुलाकर बैठक की जाती है, जो सप्लाई के टेंडर डालने में इच्छुक होती हैं। 

इसमें फर्मों की आपत्तियों और अन्य संशय दूर किए जाते हैं। इसके अतिरिक्त रूसा में पंद्रह लाख से अधिक की खरीद पर प्रमुख सचिव वित्त की अध्यक्षता में बनी कमेटी में भी खरीद की स्वीकृति ली जाती है, जो यहां नहीं ली गई। वहीं सप्लाई के टेंडर में तमाम अनोखी शर्तें रखी गईं। इसमें संबंधित फर्म का सालाना टर्नओवर साढ़े सात करोड़ ही रखा गया। इसके अतिरिक्त उत्तराखंड राज्य सरकार को बीते दस साल से सप्लाई का अनुभव मांगने के साथ ही बीते तीन वर्षों में कम से कम दो बार सप्लाई को लेकर सरकार से जारी संतुष्टि प्रमाण पत्र धारक होने की पात्रता भी रख दी गई थीं। 

अजीबोगरीब जवाब देते रहे अधिकारी
करोड़ों के कंप्यूटर खरीद की पूरी प्रक्रिया में एक और चौंकाने वाला तथ्य यह भी है कि प्री-बिड प्रक्रिया का कोई प्रावधान न किए जाने के बावजूद पंजाब की फर्म की आपत्ति पर रूसा के नोडल अफसर डॉ. सतपाल सिंह साहनी ने यह लिखकर जवाब दिया कि ई-टेंडर की अधिसूचना की तिथि से सात दिन के भीतर यानी पांच जनवरी तक ही स्पष्टीकरण प्राप्त किया जा सकता था, चूंकि टेंडर 29 दिसंबर को अधिसूचित हुआ और फर्म की क्वेरी 10 जनवरी को प्राप्त हुई है, ऐसे में इसका जवाब नहीं दिया जाएगा।

तमाम विभाग हुए बाईपास
राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (रूसा) में होने वाली खरीद की फाइल रूसा के वित्त अधिकारी के पास आवश्यक रूप से भेजी जाती है, मगर यहां ऐसा कुछ भी नहीं किया गया। यही नहीं तकनीकी उत्पाद की खरीद होने के बावजूद न तो एनआईसी और न ही आईटी विभाग को खरीद प्रक्रिया या उत्पाद के स्पेसिफिकेशन (विशिष्टता) तैयार करने में शरीक किया गया। इसके अतिरिक्त उच्च शिक्षा विभाग के अपर सचिव भी इस पूरे मामले से बाहर रखे गए। रूसा के नोडल अफसर डॉ. सतपाल सिंह साहनी सीधे परियोजना निदेशक एस. रामास्वामी को फाइल बढ़ाते और वहां से फाइल वापस नोडल अफसर के पास फाइल आती।

जेम पोर्टल से खरीद इसलिए नहीं की गई थी, क्योंकि तत्कालीन सरकार ने इसे स्वीकार नहीं किया था। सचिवालय में जिस प्रकार की टेंडर प्रक्रिया खरीद के लिए अपनाई गई थी, उसी से इन कंप्यूटरों की खरीद की गई है। 
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- एस. रामास्वामी, तत्कालीन परियोजना निदेशक (रूसा)
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