देहरादून में चल रहे लिटरेचर फेस्ट में शनिवार को कई विषयों पर डिस्कशन हुआ। इस दौरान बताया कि सिनेमा और किताबें छोटे शहरों के लिए बड़ी दुनिया का दरवाजा हैं।
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इस रास्ते होकर कई छोटे शहरों के रहने वालों ने दुनिया भर में जगह बनाई है। दून लिटरेचर फेस्टिवल के तहत शनिवार को पैनल डिस्कशन ‘सिनेमा एंड बुक्स एंड विंडोज टू द वर्ल्ड आफ स्माल टाउंस’ में यह बात उभरकर आई।
पैनल में ये हस्तियां थी मौजूद
इस डिस्कशन में मशहूर लेखक निर्देशक इम्तियाज अली, अद्वैत काला, अनुराधा मारवाह, विजया सिंह ने हिस्सा लिया। शाम के वक्त हुए एक अन्य पैनल डिस्कशन ‘कैन सिनेमा एंड लिटरेचर ब्रिंग अबाउट सोशल चेंज’ पर गौरी शिंदे, तनूजा चंद्रा, तरुण मनसुखानी ने अपनी राय रखी।
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नया दौर, जंजीर जैसी फिल्मों का उदाहरण देकर सिनेमा, साहित्य के जरिए सामाजिक बदलाव के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला।
इससे पूर्व दोपहर एक घंटे का वक्त पैनल डिस्कशन ‘द एडिटर्स पर्सपेक्टिव’ का रहा। इसमें शांतनु राय चौधरी ने संपादन से जुड़ी तकनीकी बारीकियों पर प्रकाश डाला।
‘अंजाना-अंजानी’ और ‘कहानी’ की स्क्रिप्ट रचने वाली अद्वैत काला ने स्क्रिप्ट राइटिंग की बारीकियों से अवगत कराया। 'ई-बुक्स आर किलिंग बुक्स’ विषय पर वाद-विवाद भी हुआ। इसमें जज की भूमिका मशहूर लेखिका सत्या सरन ने अदा की।
चेतन भगत की मिसाल दी
कुछ वक्ताओं ने जहां ई-बुक्स को किताबों को खत्म करने वाला करार दिया, वहीं कुछ ने चेतन भगत की मिसाल देते हुए किताबों का जमाना फिर से लौटने की बात पर मुहर लगाई।
सत्या सरन ने क्रिएटिव राइटिंग की बारीकियों से भी रूबरू कराया। सात्विक के निर्देशन में हुए नाटक टेन इयर्स विद गुरुदत्त के साथ लिटरेचर फेस्टिवल का दूसरा दिन अंजाम तक पहुंचा।
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