‘दीदी! बहुत बुरा लगता है, जब मुझे भइया की तरह खाना नहीं मिलता...’। ‘लड़कियों को क्या ज्यादा पढ़ाना? जितना पैसा पढ़ाने में लगेगा, उतना दहेज जोड़ लेंगे...’।
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यह दोनों डायलॉग आपको बेशक किसी पुरानी हिंदी फिल्म में दिखाए जाने वाले गांव का किस्सा मालूम दें, लेकिन यह सच है। सच भी दून से केवल 25 किलोमीटर की दूरी पर बसे छरबा का।
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इसके नजदीकी गांवों में लड़कियां परिवार में आज भी दोयम दर्जे के नागरिक की हैसियत में हैं।
सर्वे में सामने आई हकीकत
बेटे के मुकाबले उनके खान-पान के प्रति लापरवाही और शिक्षा को लेकर यह बेरुखी सामने आई एमकेपी पीजी कालेज के मनोविज्ञान विभाग के वूमेन सेल के सर्वे में।
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सर्वे के लिए सौ छात्राओं के चार ग्रुप बनाए गए थे। इन्होंने सौ घरों का सैंपल निर्धारित कर इन घरों में जाकर युवतियों, बालिकाओं, उनके परिजनों से बात-चीत की। इस आधार पर इन्होंने अपनी रिपोर्ट तैयार की।
संस्थाओं की खुली पोल
प्रोग्राम कन्वेनर डा. गीता बलोदी के मुताबिक स्थिति बताने के लिए काफी है कि यहां वाकई लिंग समानता और बालिका शिक्षा का ढोल पीटने वाली संस्थाओं को झांकने की जरूरत है।