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बेटों की चाह रखने वालों को एक बेटी ने दिया जवाब

Wed, 28 Jan 2015 12:58 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
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बेटों की चाह रखने वाले माता-पिताओं को देहरादून की बेटी ने अपनें हौसले से करारा जवाब दिया है। संघर्षों और बाधाओं के बावजूद हार न मानने वाली कैप्टन दीपिका चमोली (सेवानिवृत्त) के जीवन का दूसरा नाम ही चुनौती रहा।
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पग-पग पर एक नई मुश्किल और हर मोड़ पर एक नई बाधा। माता-पिता का अचानक छिना साया और सिर पर तीन छोटी बहनों की जिम्मेदारी। कोई और होता तो शायद हार जाता, लेकिन दीपिका ने संघर्ष की राह चुनी।

वो लड़ीं, अपनी पढ़ाई जारी रखी, सेना की मुश्किल नौकरी चुनी, छोटी बहनों को काबिल बनाया और हर मुश्किल को खुद के आगे बौना साबित कर दिया।

सचमुच दीपिका की कहानी मिसाल है, सिर्फ बेटियों के लिए नहीं, बेटों के लिए भी। दून के डीएल रोड निवासी 33 वर्षीय दीपिका के पिता बीपी चमोली सीमा सुरक्षा बल में थे। चार बहनों में दीपिका सबसे बड़ी हैं।
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दसवीं तक श्री गुरु रामराय स्कूल सहस्त्रधारा रोड और बारहवीं तक केंद्रीय विद्यालय सर्प्लाई से पूरी करने के बाद दीपिका ने डीबीएस महाविद्यालय में स्नातक में दाखिला लिया ही था कि वर्ष 2001 में कैंसर से मां कुमुद चमोली चल बसीं।

मिलिट्री नर्सिंग कोर्स से सेना में हुई भर्ती

कुछ ही समय बाद परिवार के कुछ संभलते ही पिता बीपी चमोली का भी एक हादसे में निधन हो गया। अब अपने साथ तीन बहनों का जिम्मा दीपिका पर था। मामा आरएन डोभाल का सहारा मिला और किसी तरह दीपिका ने स्नातक तक पढ़ाई पूरी की।

छोटी बहनों की पढ़ाई जारी रखने के लिए दीपिका का आय का साधन जुटाना जरूरी था। लिहाजा वर्ष 2004 में वह मिलिट्री नर्सिंग कोर्स के जरिये सेना में भर्ती हो गईं। साढ़े तीन साल के कड़े प्रशिक्षण के बाद वर्ष 2007 में उन्होंने कमीशन प्राप्त किया। नौकरी तो लगी, लेकिन दीपिका के भीतर आगे बढ़ने की हसरत दबी रह गई।

दीपिका नौकरी में मेहनत करतीं और घर में छोटी बहनें भी दीदी के संघर्ष की कद्र करते हुए पढ़ाई में जुटी रहीं। दीपिका की छोटी बहन शिखा आईआईटी से इंजीनियरिंग के बाद अब कैलीफोर्निया में बस चुकी हैं, उनसे छोटी रूपा टेक्सटाइल डिजाइनर हैं तो सबसे छोटी स्वाति सॉफ्टवेयर इंजीनियर।

तीनों बहनों के अपने पैरों पर खड़ा होते ही दीपिका ने अपनी हसरत पर ध्यान देना शुरू किया। सेना में नौ साल की नौकरी के बाद दीपिका ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली। अब घर पर रहकर वह लेखन और पढ़ाई में जुट गई हैं।
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कविताओं का है शौक

कैप्टन दीपिका बताती हैं कि पढ़ने-लिखने का शौक उनमें मां कुमुद चमोली से जगा। बताया कि उनकी मां ने वर्ष 1966 में हिंदी में परास्नातक कर लिया था, जब बालिकाओं में शिक्षा का स्तर काफी कम था। बताया कि उन्होंने ई-बुक्स के जरिये लेखन का शौक पूरा करना शुरू किया।

अब तक कई ई-बुक्स प्रकाशित हो चुकी हैं। वर्ष 2014 में दीपिका का कविता संग्रह ‘जीवन एक समन्वय’ प्रकाशित हुआ। दीपिका को पर्वतारोहण से भी लगाव रहा है। वर्ष 2011 में सेना में रहते हुए उन्होंने ‘ज्वाइंट इंडो-नेपाल इको हिमालयन ट्रैक’ किया था।

अब करेगी शोध
दीपिका का रुझान बौद्ध धर्म और ध्यान पर है। इन दिनों वह ‘क्लीनिकल साइकोलॉजी विद फोकस इन मेडिटेशन’ पर पीएचडी कर रही हैं। 2013 में उन्होंने इसी विषय पर दो अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए।
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