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नींद में रहेंगे भगवान विष्णु तो शुभ कार्यों पर ब्रेक

Tue, 21 Jul 2015 01:32 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
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देवशयनी एकादशी के साथ ही चार महीने के लिए भगवान विष्णु नींद में चले जाएंगे। भगवान विष्णु के नींद में जाते ही चार महीनों के लिए शुभ कार्यों पर ब्रेक लग जाएगा। इसी के साथ चातुर्मास की शुरुआत हो जाएगी। चातुर्मास शुरू होते ही संत-महात्मा एक स्थान पर रहकर तपस्या करेंगे और श्रद्धालु व्रत करेंगे।
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आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। इस बार देवशयनी एकादशी 27 जुलाई को है। माना जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु क्षीर सागर में शयन के लिए चले जाते हैं। भगवान के शयन के साथ ही मुंडन, गृह प्रवेश, शादी-ब्याह जैसे शुभ कार्य बंद हो जाते हैं।

उत्तराखंड विद्वत सभा के उपाध्यक्ष आचार्य भरत राम तिवारी के अनुसार, इस बार खास बात यह है कि देवशयनी एकादशी पर ठीक वही योग बन रहा है, जो 27 जुलाई 1996 को बना था। उस समय सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, राहु, केतु जिन राशियों पर थे, उन्हीं पर इस बार भी हैं।
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तब भी सूर्य संक्रमण के पश्चात ही देवशयनी एकादशी पड़ी थी। 24 सितंबर को कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन यानी परिवर्तनी एकादशी के मौके पर भगवान करवट लेंगे। 22 नवंबर को हरिप्रबोधिनी और देवोत्थान एकादशी के दिन भगवान को शंखनाद कर नींद से उठाया जाएगा। इसके साथ ही शुभ कार्य शुरू हो जाएंगे।

अपनी प्रिय वस्तु का त्याग
चातुर्मास के दौरान संत-महात्मा एक ही स्थान पर रुककर तप, जप आदि करते हैं। वहीं श्रद्धालु अपनी पसंदीदा वस्तु का त्याग कर सकते हैं। खासकर जैन समाज के लोग विधि-विधान से व्रत करते हैं। एक ही समय भोजन करते हैं। इसके साथ ही अपना प्रिय फल, प्रिय मिष्ठान आदि का त्याग कर चार्तुमास के समापन पर उसका दान करते हैं।

भोजन के भी हैं नियम
एक ओर जहां डॉक्टर मौसम के अनुसार भोजन करने की सलाह देते हैं। वहीं शास्त्र भी विज्ञान की तरह चातुर्मास के लिए कुछ नियमों का पालन करने को कहता है। शास्त्रों के अनुसार, श्रावण मास में शाक यानी हरी सब्जी का सेवन नहीं करना चाहिए। उसमें कीड़े आदि का डर रहता है।

भादों के महीने में दही पेट में तेजाब की तरह काम करने लगती है, इसलिए उससे परहेज करने को कहा गया है। कार्तिक के महीने में दालें खाने से यूरिक एसिड आदि की समस्या हो सकती है।

इसलिए दालों से इस मौसम में परहेज करने की सलाह दी गई है। माघ माह में मूली से ठंड आदि लगने की संभावना के चलते यह नहीं खाने को कहा गया है। डॉ. आचार्य सुशांत राज के अनुसार शास्त्रों में दी गई जानकारियों का पालन किया जाए तो व्यक्ति स्वत: ही स्वस्थ रहेगा।
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