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अब गमले में उगाइए सेब, बनाइए सेहत

Tue, 21 Jul 2015 12:33 PM IST
बिशन सिंह बोरा / अमर उजाला, देहरादून
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घर के फल और सब्जियां खाने की इच्छा सबकी होती है, लेकिन भूमि की कमी के चलते यह पूरी नहीं हो पाती।
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ऐसे लोगों के लिए सेब की रूट स्टॉक सुपरचीफ और शैलेट स्पर प्रजातियां काफी फायदेमंद हो सकती हैं। ये प्रजातियां बहुत कम जगह में शीघ्र उत्पादन देने लगती हैं। इन प्रजातियों को किचन गार्डन या गमले में भी लगाया जा सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इसके एक पौधे से 30 किलोग्राम तक उत्पादन लिया जा सकता है।

उद्यान विशेषज्ञों के मुताबिक पहाड़ में 50 नाली भूमि पर सामान्य प्रजाति के सेब के 250 पौधे लगाए जा सकते हैं। वहीं इतनी ही जगह पर स्पर प्रजाति के 4 हजार से अधिक पौधे लगाए जा सकते हैं। एक से डेढ़ मीटर की दूरी पर इसे लगाया जाता है।
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इसके पौधे लगाने के तीन साल बाद ही फल लगने लगते हैं। इससे एक पौधे से 30 किलोग्राम तक उत्पादन लिया जा सकता है। उत्तरकाशी में सेब की नर्सरी कर रहे एवं रुद्रप्रयाग निवासी इंद्रभूषण कुमोला बताते हैं कि 50 नाली भूमि पर 880 क्विंटल सेब का उत्पादन किया जा सकता है। सेब की ये प्रजातियां हॉलैंड की हैं।

मैदान में नहीं उगाया जा सकता
स्पर प्रजाति के सेब को मैदान में नहीं उगाया जा सकता। उत्तराखंड के ही मैदानी जिलों में इसे नहीं उगाया जा सकता। हालांकि, दून के चकराता, कालसी, मसूरी एवं अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में इसे घर में गमलों में भी लगाया जा सकता है।

पहाड़ में सेब की स्पर प्रजातियां बहुत कम हैं। 60 फीसदी से अधिक सामान्य प्रजातियां हैं। स्पर प्रजातियां को गमलों में लगाया जा सकता है।
- बीएस नेगी, निदेशक बागवानी मिशन

मुख्यमंत्री भी दे रहे जानकारी
हरेला कार्यक्रमों के दौरान मुख्यमंत्री हरीश रावत भी सेब की ऐसी प्रजातियों की जानकारी दे रहे हैं, जिन्हें लोग घर में गमलों में उगा सकते हैं। सीएम का कहना है कि घर के गमलों में दो पेड़ लगाकर अपनी आवश्यकता के अनुरूप सेब का उत्पादन किया जा सकता है।

यहां होता है सेब का अधिक उत्पादन
उत्तराखंड में उत्तरकाशी के हर्षिल, नौगांव, टिहरी में धनोल्टी, चमोली में ग्वालदम, जोशीमठ, बागेश्वर में कपकोट, पिथौरागढ़ में धारचूला, मुनस्यारी, डीडीहाट, गंगोलीहाट, अल्मोड़ा में चौबटिया, दुनागिरी आदि क्षेत्रों में सेब की बागबानी होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार कम हिमपात और तापमान में बढ़ोतरी से यहां सेब का उत्पादन प्रभावित हो रहा है।
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कम ठंडी जगहों पर भी हो सकता है उत्पादन
बागवानी मिशन के निदेशक बीएस नेगी बताते हैं कि सेब की रूट स्टॉक स्पर प्रजातियों के लिए चिलिंग रिक्वायरमेंट सेब की सामान्य प्रजातियों से कम होती है।

स्पर प्रजातियों के सेब का आठ सौ से एक हजार घंटे के चिलिंग रिक्वायरमेंट में उत्पादन किया जा सकता है। जबकि सामान्य प्रजाति के सेब के लिए 1200 से 1500 घंटे के चिलिंग रिक्वायरमेंट की आवश्यकता होती है।
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