राजधानी देहरादून के जौनसार बावर क्षेत्र में बोक्सा जनजाति की छात्राएं इन दिनों सिस्टम की सुस्ती की वजह से घर बैठी हुईं हैं। 2006 में लाखा मंडल से जुडली (धर्मावाला) में शिफ्ट हुए बालिका छात्रावास के बंद होने से इन लड़कियों को पिछले 15 दिनों से मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
जौनसार बावर क्षेत्र में बोक्सा जनजाति की छात्राओं को पढ़ाई के दौरान रहने में दिक्कतों का सामना न करना पड़े इसके लिए सामाजिक संगठन भारतीय आदिम जाति सेवक संघ ने लाखा मंडल में आश्रम पद्धति बालिका छात्रावास खोला था। इसे 2006 में लाखा मंडल से जुडली (धर्मावाला) में शिफ्ट किया गया। यहां यह किराए के भवन में चल रहा था। इसमें रहकर लड़कियां आसपास के स्कूलों में पढ़ाई करती थी।
छात्राएं छात्रावास छोड़कर घर चली गई
मामले को बार-बार संबंधित विभाग के अधिकारी के संज्ञान में लाया गया लेकिन उसने कोई कार्रवाई नहीं की। अब जबकि छात्राएं छात्रावास छोड़कर घर चली गई हैं तो अधिकारी कह रहे हैं कि मामला उनके संज्ञान में नहीं है। इसकी जांच कराएंगे। जब तक जांच होगी छात्राएं घर बैठी रहेंगी। इस बीच उनकी पढ़ाई का क्या होगा, जबकि छमाही परीक्षाएं होने वाली हैं।
छात्रावास को चलाने के लिए केंद्र सरकार की तरफ से एक छात्रा के लिए दस माह के खर्च के लिए नौ सौ रुपये मिलने थे। जो जनजाति निदेशालय को बार-बार पत्र लिखने पर भी नहीं मिला। छात्रावास में आरंभ में 64 छात्राएं रहती थीं, लेकिन आर्थिक दिक्कतों की वजह से छात्राएं जाती रही तो केवल 25 लड़कियां बची थी। 15 दिन पहले छात्रावास को बंद करने की वजह से 25 छात्राएं भी घर चली गईं। अब इनकी पढ़ाई बंद हो गई है।
फरवरी में अमर उजाला ने छापी थी खबर
अमर उजाला ने फरवरी माह में मामले को प्रमुखता से उठाया तो अधिकारी नए सिरे से छात्रावास को धन मुहैया कराने की बात करने लगे। लेकिन इसी बीच अधिकारी बदल गए और मामला आया गया हो गया। फरवरी माह से लेकर अब तक छात्रावास से जुड़ी फाइल तहसील में धूल फांक रही है।
यह मिलना था छात्राओं को
केंद्र सरकार द्वारा गैर सरकारी संस्थाओं को जनजातिय क्षेत्र की बालिकाओं के शैक्षणिक उत्थान के लिए छात्रावास खोलने पर प्रति छात्रा के हिसाब से आर्थिक मदद दी जाती है। नियमों के मुताबिक हास्टल में रहने वाली प्रति छात्रा के लिए केंद्र के मानकों के हिसाब से दस महीने का 900 रुपए बजट तय है। छात्राओं को मुफ्त में यूनिफार्म, भोजन, स्टेशनरी, मेडिकल, कल्चरल एक्टिविटी के लिए भी दिए पैसे देने का प्रावधान है। पिछले तीन साल से भारतीय आदिम जाति सेवक संघ द्वारा जुडली में खोले गए छात्रावास को कोई मदद नहीं दी गई।
राशन और किराए के अभाव में 15 दिन पूर्व मजबूरी में छात्राओं को घर भेजना पड़ा। मेरी आर्थिक स्थिति भी ऐसी नहीं की मैं सारा खर्च उठा सकूं।
-मीना श्रीवास्तव, वार्डन
मामले में जानकारी नहीं है। इसकी जांच की जाएगी और कारण जाना जाएगा कि आखिर क्यों अभी तक छात्रावास को धन नहीं मिला।
-टीकम सिंह पंवार जनजातीय निदेशक
मैंने अभी-अभी चार्ज लिया है। मामला संज्ञान में नहीं है। इस मामले से संबंधित जानकारी मिलने पर ही मैं कुछ कह सकूंगा।
-एके पांडेय एसडीएम विकासनगर