कभी राजधानी के बीचोबीच से होकर कलकल बहने वाली नदियां रिस्पना और बिंदाल न सिर्फ नाले में तब्दील हो चुकी हैं, वरन नदियों के पुनर्जीवीकरण को लेकर सरकार और तमाम संबंधी सरकारी विभाग एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाए हैं।
मुख्यमंत्री की प्राथमिकता वाली योजनाओं के प्रति अधिकारी कितने गंभीर हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जाता जा सकता है कि दो साल की अवधि बीत जाने के बावजूद अभी तक सिर्फ रुड़की स्थित राष्ट्रीय जलविज्ञान के वैज्ञानिक दोनों नदियों का अध्ययन कर पाए हैं।
हालांकि संस्थान के वैज्ञानिकों की ओर से 10 माह पूर्व नदियों के पुनर्जीवीकरण को लेकर विस्तृत रिपोर्ट सौंपी जा चुकी है। इसके अलावा अभी कुछ भी कार्रवाई नहीं हो पाई है। सरकार शासन से लेकर तमाम सरकारी विभागों की मशीनरी जिस कछुए की गति से काम कर रही है।
बिंदाल नदी की स्थिति
मसूरी की पहाड़ियों से स्थित झरनों से निकलकर देहरादून की वादियों में कभी कलकल करती हुए बहने वाली बिंदाल नदी ना सिर्फ नाले में तब्दील हो चुकी है वरन जिला प्रशासन, सिंचाई विभाग, वन विभाग समेत तमाम विभागों की लापरवाही के चलते नदी के किनारों पर जबरदस्त अतिक्रमण भी है।
पूर्व में कराए गए सर्वे में बात सामने आई थी कि बिंदाल नदी में 4266 अतिक्रमण हैं। इसे हटाने को लेकर सरकार शासन और जिला शासन के स्तर पर कभी कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। फिलहाल आज की तारीख में बिंदाल नदी एक गंदे नाले से अधिक कुछ भी नहीं है।
रिस्पना नदी
बिंदाल नदी की तर्ज पर ही मसूरी से ही निकलने वाली रिस्पना नदी की भी हालत बिंदाल जैसी ही है। 70 के दशक में नदी इतनी साफ-सुथरी थी कि इसमें भारी मात्रा में मछलियों के साथ ही तमाम जलीय जंतु पाए जाते थे। इतना ही नहीं रिस्पना नदी का पानी इतना साफ सुथरा था कि इसका इस्तेमाल पीने के लिए किया जाता था। आज रिस्पना नदी इतनी मैली हो चुकी है कि जो गंदे नाले से अधिक कुछ भी नहीं है।
सुसवा की भी हालत दयनीय
रिस्पना और बिंदाल की तर्ज पर ही राजाजी टाइगर रिजर्व के वन्यजीवों के लिए लाइफलाइन कही जाने वाली सुसवा नदी की भी हालत बेहद खराब है। रिस्पना, बिंदाल की तरह ही सुसवा नदी मे तमाम खतरनाक रसायनों की मात्रा है। इसके लिए वन्यजीव विज्ञानी भी कई बार वन विभाग के अधिकारियों को अवगत करा चुके हैं, लेकिन नदी के पुनर्जीवीकरण को लेकर सरकार शासन समेत अन्य स्तरों पर कोई कदम नहीं उठाया गया है।
सौंग नदी
मसूरी की पहाड़ियों से निकलकर धनोल्टी होते हुए 180 किलोमीटर का सफर तय दून वैली तक पहुंचने वाली सौंग नदी की स्थिति वैसे तो रिस्पना और बिंदाल की तुलना में थोड़ी ठीक है। हालांकि नदी के जल को और साफ सुथरा किए जाने की जरूरत है। कालीगाड़, सहस्रधारा, आसन और रिस्पना जैसी नदियां इसकी सहायक नदियां हैं। डोईवाला क्षेत्र के गांव के ग्रामीणों को पीने के पानी के साथ ही खेतों की सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराया जा सके। इसके लिए नदी पर करोड़ों रुपये की लागत से बांध भी बनाया जा रहा है।
रिस्पना, बिंदाल में क्रोमियम, सीसा, मैगनीज जैसे खतरनाक रसायनों की भरमार
सोसायटी फॉर पॉल्युशन एंड कंजर्वेशन सोसायटी (स्पेक्स) के वैज्ञानिकों की ओर से किए गए एक शोध में यह बात सामने आई है कि रिस्पना और बिंदाल नदियों में क्रोमियम, सीसा, मैग्नीज के अलावा ग्रीस और तेल की भरमार है। ऐसे में यदि किसी इंसान, जानवरों द्वारा दोनों नदियों के जल का सेवन किया जाता है तो उनके लिए यह जानलेवा साबित हो सकता है। दिलचस्प पहलू यह है कि कभी रिस्पना और बिंदाल दोनों नदियां शुद्ध जल का बड़ा स्रोत हुआ करती थी, लेकिन आज दोनों की नदियों की हालत बेहद खराब है।
रिस्पना और बिंदाल नदियों के पुनर्जीवीकरण किया जा सके इसके लिए राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों से दोनों नदियों का तकनीकी अध्ययन कराया गया है। इसकी विस्तृत रिपोर्ट जिला प्रशासन, सिंचाई विभाग, जल संस्थान, जलनिगम, वन विभाग समेत सभी संबंधित विभागों को भेज दी गई है। सभी विभागों द्वारा अपने स्तर पर डीपीआर तैयार किया जा रहा है।
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बीके पांडे, अधीक्षण अभियंता, सिंचाई विभाग