सवाल उठने से लेटलतीफी का खतरा
चीफ टाउन प्लानर के ड्राफ्ट दून मास्टर प्लान पर सवाल उठने के बाद लेटलतीफी का खतरा सताने लगा है। पहले ही दून मास्टर पर संकट कम नहीं रहे। वर्तमान में लागू मास्टर प्लान को वर्ष 2001 में लागू कर दिया जाना चाहिए था। इसे देरी के के कारण 2005 में लागू किया गया। खामियों के चलते मास्टर प्लान को वर्ष 2008 में प्रभावी किया जा सका। इसे भी वर्ष 2013 में संशोधित करने की जरूरत पड़ गई। प्लान में वर्ष 2025 तक के विकास का खाका था। मास्टर प्लान विलंब से लागू किया गया तो इसका व्यापक असर दून के विकास पर पड़ा।
अवैध निर्माणों को मिलेगा बढ़ावा
नए मास्टर प्लान में लेटलतीफी भारी पड़ सकती है। वर्ष 2008 में एमडीडीए के मास्टर प्लान को विलंब से लागू किया गया। तब तक शहर 1463 हेक्टेयर में फैल चुका था। वर्ष 2003 तक शहर में विस्तार की दर 32 प्रतिशत थी। अगले पांच साल में यह 49 प्रतिशत तक पहुंच गई। मास्टर प्लान के अभाव में खुलकर मनमर्जी से निर्माण किए गए। अगर अब मास्टर प्लान में लेटलतीफी हुई तो अवैध निर्माणों को बढ़ावा मिलेगा।
दून के मास्टर प्लान पर लगीं प्रमुख आपत्तियां
- मास्टर प्लान अंग्रेजी में है। ड्राफ्ट को हिंदी और सरल भाषा में आम लोगों तक पहुंचाकर राय ली जाए।
- आमजन के साथ शहर के सभी प्रमुख क्षेत्रों में जनसंवाद कर मास्टर प्लान पर चर्चा की जाए।
- आवासीय, व्यावसायिक और ग्रीन एरिया में संतुलन बनाया जाए
- सड़कों की चौड़ाई मास्टर प्लान में 12 मीटर रखी गई है, इसका धरातल पर मिलान भी कराया जाए।
- औद्योगिक क्षेत्रों की स्थिति स्पष्ट की जाए, जहां औद्योगिक क्षेत्र दर्शाए गए वहां सुविधाओं पर चर्चा हो।
देहरादून में प्रस्तावित मास्टर प्लान पर सुनवाई की गई है। सभी आपत्तियों का निस्तारण किया जा रहा है। शहर जनता के लिए है और उनकी राय सबसे अहम है। बगैर शहरवासियों की सहमति के कोई मास्टर प्लान लागू नहीं किया जाएगा।
- बंशीधर तिवारी, उपाध्यक्ष, एमडीडीए