संगीता ने बताया कि वह बाल एवं महिला विकास के वन स्टॉप सेंटर में केस वर्कर के रूप में कार्यरत थीं। उन्हें नौकरी छोड़कर स्वरोजगार को चुना। इसमें अब वह महिलाओं को भी रोजगार दे रही हैं। वर्तमान में अभी उनका कार्य छोटे पैमाने पर है, जिसमें छह महिलाएं कार्यरत हैं।
ऐसे मिली प्रेरणा
संगीता ने बताया कि जब वन स्टॉप सेंटर में थीं तो वहां आपराधिक घटनाओं से पीड़ित महिलाओं को रखा जाता था। उन्हें कानूनी, मेडिकल, शैक्षिक व अन्य परामर्श व सुविधाएं दी जाती थी, लेकिन महिलाओं को नई जिंदगी शुरू करने के लिए रोजगार नहीं मिल पाता था। उनके मन में विचार आया कि क्यों न वह स्वयं इस दिशा में कार्य करें। तभी से उन्होंने यह निश्चय किया। इस मुहिम में उनके पति विजय थपलियाल ने भी पूरा सहयोग करते हैं। विजय निरंजपुर कृषि मंडी समिति में सचिव पद पर कार्यरत हैं।
कई मंदिरों में दिख सकता है बदलाव
संगीता ने बताया कि कॉटन की चुनरियों के उपयोग को लेकर उन्होंने ऋषिकेश गंगा सेवा समिति, केदारनाथ व बद्रीनाथ मंदिर में संपर्क किया है। समितियों की ओर से सकारात्मक रूख भी देखने को मिला है। यदि इन बड़े धार्मिक स्थलों में यह प्रयोग शुरू हो जाए तो इससे बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा।
ये होंगे फायदे
उन्होंने बताया कि कॉटन की चुनरियों से नदियां प्रदूषित होने से बचेंगी, लेकिन इसके कई फायदे भी हैं। कॉटन की चुनरियों से बच्चों के कपड़े भी बनाए जा सकते हैं। संगीता ने कहा कि वह मंदिरों से उपयोग से बाहर हुईं चुनरियां लेंगी और उनके कपड़े बनाएंगी। ये कपड़े गरीब बच्चों को दिए जाएंगे। उन्होंने कहा कि पहले भी यही व्यवस्था थी कि मंदिरों में चढ़ाने वाले कपड़े व सामान गरीबों को दिए जाते थे, ताकि अमीर व गरीब के बीच की असामनता को दूर किया जा सके।