देहरादून-विकासनगर-डाकपत्थर रूट की बसों में न केवल यात्री जान को हथेली में रखकर चलते हैं, बल्कि यह बसें सड़क पर चलने वालों के लिए मौत बनकर दौड़ती है। यहीं नहीं बसों में छेड़छाड़ और चालक, परिचालक और हेल्परों की गुंडागर्दी की शिकायतें भी अक्सर मिलती हैं, लेकिन न तो पुलिस और न ही परिवहन निगम की नजर इन बसों पर पड़ती है।
देहरादून-विकासनगर-डाकपत्थर रूट की बस की ओर से एफआरआई गेट के सामने साइकिल सवारों को टक्क र मारकर घायल करना पहला मामला नहीं है।
पिछले दो-तीन साल के अंदर यह बसें कई लोगों को कुचल चुकी हैं और कई को घायल कर चुकी हैं। इसके बावजूद सरकारी तंत्र की नींद टूटने का नाम नहीं ले रही। इसके अलावा इन बसों में अक्सर छेड़छाड़ के साथ ही चालक परिचालक और हेल्पर की गुंडागर्दी आम बात है।
यात्रियों की मानें तो बसों में चालक व परिचालक की किसी हरकत का यदि किसी ने विरोध कर दिया तो उसकी शामत पक्की है। सवारियों से मारपीट, बदसलूकी समेत बीच रास्ते में बस रोककर उन्हें उतार दिया जाता है। यह बात पुलिस और परिवहन निगम से छुपी नहीं हैं। रोज इनकी शिकायतें होती रहती है, लेकिन न तो पुलिस और न ही परिवहन निगम इनके खिलाफ कोई कार्रवाई करता है।
लेट फाइन है रफ्तार का खेल
बताया जा रहा है कि बसों की रफ्तार का खेल इनका लेट फाइन है। दरअसल, जगह-जगह बसों के चेक प्वाइंट हैं, जहां समय से नहीं पहुंचने पर प्रति मिनट 30 रुपये लेट फाइन देना पड़ता है। चालक पहले तो स्टॉपेज पर यात्रियों के लिए देर तक बस खड़ी रखते हैं और लेट फाइन बचाने के लिए रास्ते में बेकाबू गति से बस दौड़ाते हैं।