कश्मीरी पंडितों ने कहा कि आज भी उस दौर को याद कर उनके रौंगटे खड़े हो जाते हैं। उसके बावजूद अगर रोजगार और सुरक्षा का दिलासा मिले तो वह कश्मीर लौट सकते हैं। उन्होंने कहा कि देश के अलग-अलग हिस्सों में रहने के बावजूद आज भी उनके दिलों में कश्मीर की यादें बसी हुई हैं।
संवाद में शिक्षाविद् दिनेश पंडिता, सेवानिवृत्त बीमा अधिकारी अशोक कल्ला, ग्राफिक एरा विवि के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी बीके कौल, अधिवक्ता सुरेश कुमार धर, पीएन भट्ट, संजय रैना, अधिवक्ता अशोक कौल, पीके कौल, एमबीए छात्र विशाल कौल आदि शामिल हुए।
ये हैं कश्मीरी पंडितों का दर्द और मांगें
-कश्मीरी पंडितों ने 1990 में उत्तराखंड को अपने नए घर के रूप में चुना, लेकिन यहां की सरकारों ने हमेशा उनके साथ उपेक्षित व्यवहार किया।
-उत्तर प्रदेश के समय से लेकर आज तक उत्तराखंड में किसी सरकार ने कश्मीरी पंडितों की समस्याओं को जानने का प्रयास नहीं किया।
-बड़ी संख्या में अपना सब कुछ छोड़कर आए परिवारों को आज भी मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल पाई है। उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं के लिए भटकना पड़ रहा है।
-हमारे पास एक ऐसी जगह तक नहीं, जहां हम लोग एक-दूसरे से मिल सकें। अपने त्योहार मना सकें या संस्कृति का संरक्षण कर सकें।
-जिन लोगों के पास अपने घर नहीं हैं, उनके लिए राज्य सरकार को कम कीमत पर आवास की व्यवस्था करनी चाहिए। एलआईजी, एमआईजी और एचआईजी परियोजनाओं में रिजनेबल रेट्स पर उन्हें फ्लैट दिए जाने चाहिए।
-कश्मीरी पंडितों की सांस्कृतिक, शैक्षणिक व सामाजिक गतिविधियों, आपसी मेलजोल के लिए एक सामुदायिक भवन होना चाहिए। इसके लिए सरकार को भूमि उपलब्ध करानी चाहिए।
-जम्मू से देहरादून के लिए सीधी रेल सेवा की जरूरत है। अभी लोगों को ट्रेन पकड़ने के लिए सहारनपुर जाना पड़ता है।
-जम्मू और देहरादून के बीच चलने वाली बस का किराया बहुत ज्यादा है। इस बस के किराए को संशोधित करने की जरूरत है।