प्रख्यात भू-गर्भवेता पद्मश्री प्रो. केएस वल्दिया कहते हैं कि प्रकृति से मानवीय छेड़छाड़ के दुष्परिणाम धीरे-धीरे सामने आ रहे हैं।
भारतीय उप महाद्वीप हिमालय और एशिया महाद्वीप को प्रतिवर्ष पांच सेंटीमीटर की रफ्तार से उत्तर की ओर धकेल रहा है। इससे हिमालय की चट्टानों में तनाव पैदा हो रहा है।
भारतीय हिमालय के 2500 किमी दायरे में 20 से 30 किमी गहराई की पांच-छह दरारें हैं। इन दरारों में चट्टानों के आपस में टकराने से तनाव एकत्र होता रहता है जिससे भूकंप का खतरा पैदा होता है।
जीबी पंत हिमालय पर्यावरण और विकास संस्थान कोसी कटारमल में बुधवार को ‘उत्तराखंड प्राकृतिक आपदा और मानव त्रासदी’ विषय पर प्रस्तुत अपने व्याख्यान में डॉ. वल्दिया ने यह बात कही।
मध्य हिमालय में आती है सर्वाधिक आपदाएं
केएस वल्दिया ने कहा कि बीते 55 सालों में उन्होंने 55 हजार किमी पदयात्राएं की हैं। मध्य हिमालय में अधिकांश मानव आबादी निवास करती है और इसी क्षेत्र में सर्वाधिक आपदाएं आती हैं।
हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन की वजह से ही जाड़ों में बारिश और हिमपात कम होगा। खंडवृष्टि अधिक होगी।
प्रो. वल्दिया ने कहा कि पर्वतीय क्षेत्र में मजबूत चट्टानों के बीच सड़क काटना हालांकि कठिन है, लेकिन इसमें सड़क के बार-बार धंसने का खतरा नहीं होता।
साथ ही सड़कों के आसपास जल निकास की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। मुख्य अतिथि संसदीय सचिव मनोज तिवारी, विशिष्ट अतिथि पालिकाध्यक्ष प्रकाश चंद्र जोशी ने प्रो. वल्दिया का आभार जताया।
नदियों के रास्ते में निर्माण से आई आपदा
इस दौरान प्रो. वल्दिया ने कहा कि मंदाकिनी और उसका सहायक नदियों के रास्ते में निर्माण होने से केदारनाथ में आपदा आई थी।
प्रो. वल्दिया ने यह भी बताया कि उत्तराखंड में वृहद शोध के बाद उन्होंने 1965 में प्राकृतिक आपदा और भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों का मानचित्र बनाया था।
जिसमें भटवाड़ी, केदारनाथ, बदरीनाथ, मुनस्यारी के बाहरी क्षेत्रों में छेड़छाड़ नहीं करने की संस्तुति की थी लेकिन इन इलाकों में बाद में भी निर्माण होते रहे। जिससे इन इलाकों में आपदाएं आती रही।
संस्थान के निदेशक डॉ. पीपी ध्यानी ने सभी अतिथियों का स्वागत किया। संयोजक डॉ. राकेश सुंदरियाल ने प्रो. वल्दिया का जीवन परिचय प्रस्तुत किया।
इस दौरान डॉ. नंदी, उत्तराखंड सेवा निधि के निदेशक पद्मश्री डॉ. ललित पांडे, डॉ. जेएस मेहता समेत अनेक लोग मौजूद थे।