राठौर ने अपना परिचय देते हुए बताया कि वह 28 सालों से इसी होटल में ठहरते रहे हैं। उनकी आईडी पहले से होटल में जमा है। कमरे से बुलाने का कारण पूछने पर दरोगा विजय पाल आपे से बाहर हो गया।
वह होटल के मैनेजर से कमरे की मांग कर रहा था। कमरा नहीं मिलने से भड़के दरोगा ने पत्रकार और होटल मैनेजर के साथ दुर्व्यवहार किया और सुधीर को पुलिस की गाड़ी में बैठाकर थाने ले गया। विरोध करने पर थाने में सुधीर की बेरहमी से पिटाई की गई।
घटना की जानकारी मिलने पर कुछ पत्रकार थाने में पहुंचे तो दरोगा वर्दी का रौब दिखाता रहा। उसने सुधीर का मेडिकल परीक्षण भी करवाया। पत्रकारों के हस्तक्षेप पर पुलिस ने सुधीर को छोड़ दिया। सुधीर ने अगले दिन घटना के बाबत पुलिस को तहरीर दी। पत्रकारों ने घटना से एसपी सिटी अमित श्रीवास्तव को अवगत कराया।
रविवार की दोपहर कई पत्रकार एसपी सिटी से मिले तो उन्होंने रिपोर्ट दर्ज करने और दरोगा को निलंबित करने का आश्वासन दिया। सोमवार को पता चला कि कोतवाली पुलिस ने इस मामले में धारा 323 के तहत एनसीआर दर्ज की है और दरोगा विजय पाल को एसएसपी सुनील कुमार मीणा ने सिर्फ लाइन हाजिर किया है।
इसके बाद दरोगा के निलंबन की मांग को लेकर सोमवार दोपहर पत्रकार कोतवाली थाना परिसर में धरने पर बैठ गए। पत्रकारों ने पुलिस की गुंडागर्दी के खिलाफ नारेबाजी की और दरोगा को जल्द निलंबित करने की मांग की। एसएसपी सुनील कुमार मीणा टाल-मटोल करते रहे। बाद में शासन के अधिकारियों के हस्तक्षेप करने पर एसएसपी ने दरोगा को निलंबित करने का आदेश जारी किया।
ये सवाल अनुत्तरित
- उपनिरीक्षक विजय पाल की रात्रि ड्यूटी लगाई गई थी। रोड चेकिंग छोड़कर दरोगा होटल में क्या करने गया था?
-पुलिस अधिकारियों का कहना है कि होटल में किसी अवांछित व्यक्ति के ठहरने की सूचना नहीं थी?
-होटल में देर रात पत्रकार को रात दस बजे के बाद जगाकर उसके साथ अभद्रता क्यों की गई?
-होटल में दुर्व्यवहार करने के बाद पत्रकार को अवैध ढंग से थाने क्यों लाया गया? थाने में क्यों पीटा गया?
-पुलिस अधिकारी दरोगा को बचाने की कोशिश क्यों कर रहे थे?
हत्या-डकैती जैसे संगीन अपराधों में भी किसी को बेरहमी से पीटने का अधिकार पुलिस को नहीं है। हालांकि ऐसे ही कुछ अपराधियों के साथ अनजान कारणों से मित्र पुलिस जरूर मित्रता निभा लेती है। इसके उलट कई निर्दोष लोगों को बेवजह पुलिसिया क्रूरता का शिकार भी होना पड़ता है। ताजा उदाहरण पत्रकार सुधीर राठौर का है।
यदि उस वक्त थाने में एक परिचित पत्रकार सुधीर की पिटाई होता देख अपने सीनियर साथियों को इसकी जानकारी न देता और पत्रकार वहां नहीं पहुंचते तो दरोगा (जैसा कि पत्रकार को जीप में ले जाते वक्त कह रहा था) पटे चला ही दिया होता। एक दरोगा किस आधार पर अपने कमरे में सोए व्यक्ति को रात में अवैध रूप से थाने ले जाकर हिरासत में रख सकता है? यह सवाल अपने आप में पुलिस की कलई खोलता है।
जिला पुलिस के आला अधिकारियों का रवैया और शर्मनाक। मामला संज्ञान में आने के बाद लाइन हाजिर के नाम पर कार्रवाई की इतिश्री। रिपोर्ट लिखी तो एनसीआर। पत्रकार धरना-प्रदर्शन न करते और शासन से शिकायत न होती तो शायद इस ‘हीरो’ दरोगा को पुरस्कृत भी कर दिया जाता।
डीआईजी ने मांगी थी रिपोर्ट
डीआईजी जगतराम जोशी को रविवार को पत्रकार के साथ हुई अभद्रता मामले की जानकारी दी गई। डीआईजी ने जिला पुलिस को जल्द रिपोर्ट देने को कहा। उन्होंने दरोगा की ओर से की गई अभद्रता पर खेद जताया। बताया कि जिला पुलिस जल्द कार्रवाई करेगी।