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शेर से चूहा हो गई मुद्रा की औकात, पुराने दिनों की दिला दी याद

Sat, 12 Nov 2016 02:26 PM IST
गौरव मिश्रा/अमर उजाला, देहरादून
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नोट
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 500, हजार के नोट बंद करने के फैसले से भले ही माया, मुलायम और ममता खुश न हों पर बुजुर्ग काफी प्रसन्न नजर आ रहे हैं। हालांकि वे इस दौर में पुराने दिनों की याद करते हुए कहते हैं कि पहले मुद्रा बहुत ताकतवर थी। अब मुद्रा की शक्ति में गिरावट आई है। चंद लोगों के हाथों में दौलत आई तो मुद्रा शेर से चूहा हो गई।
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86 वर्षीय प्रेमशंकर पांडे बताते हैं कि हमारे जमाने में वेतन कम था लेकिन सस्ताई के कारण कम पैसों में खूब सामान आ जाता था। पचास-साठ दशक में घी छह से आठ रुपये प्रति किलो था। सरसों का तेल जो 65-70 के दशक में तीन रुपये किलो था वह आज 145 रुपये पहुंच गया।

बुजुर्गों ने किया पुराने दिनों को याद
85 वर्षीया मेहरु निशा बताती हैं कि बचपन में तो हमारे हाथ इकन्नी, चवन्नी, अठन्नी आना बड़ी बात होती थी। किशोरावस्था तक यही हाल रहें। 1960 में स्थितियां बदलीं और अर्थव्यवस्था में तेजी आने से मुद्रा का प्रसार तेजी से फैला।
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तब कागज के नोटों के प्रचलन में तेजी आई। सामाजिक कार्यकर्ता खेमचंद गुप्ता बताते हैं कि जब वे युवा व प्रौढ़ थे तो सबसे बड़ा नोट सौ रुपये का था और खाने पीने का सामान और कपड़े काफी सस्ते थे। 76 वर्षीय जियाउल हसन जैदी का कहना है कि अब तो पांच सौ और हजार रुपये की कीमत ही कुछ नहीं रह गई। 70 वर्षीया रंजीता कौर खां भी यही कहना है।
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करेंसी के अधिक सर्कुलेशन से हुई दिक्कत 

नोट
पूरी अर्थव्यवस्था मनी इकॉनामी हो गई है। पिछले लंबे समय से करेंसी का सर्कुलेशन बाजार में बहुत ज्यादा हो गया है। सरकारें नोट अधिक छापती रही हैं। इस वजह से मुद्रा (करेंसी) की ताकत कम हो गई। इसका लगातार अवमूल्यन होता जा रहा है। जैसे कोई चीज बाजार में अधिक आ जाती है तो उसका मूल्य कम हो जाता है। उसी तरह करेंसी के जरूरत से ज्यादा सर्कुलेशन के कारण महंगाई बढ़ी है। 
-डॉ. बीएनएस भटनागर, -वरिष्ठ अर्थशास्त्री 

ओवर स्पेंडिंग का बड़ा शत्रु 
हमारी अर्थव्यवस्था जिसमें उत्तराखंड की इकॉनामी भी शामिल है ओवर स्पेंडिंग का शिकार है। इसका भयानक परिणाम होता है आर्थिक विषमता और महंगाई। चंद लोगों की तरक्की को विकास कहा जा रहा है। बुनियादी तौर पर यह हाईप्ड इकोनॉमी (गुब्बारा इकॉनामी) है। इसके पीछे कुछ एक फीसदी लोगों का भयानक लोभ और लालच काम कर रहा है। उपभोक्तावाद पर आधारित यह अर्थव्यवस्था आज नहीं तो कल ढहेगी। इसलिए मोदी सरकार का फैसला काबिलेतारीफ है। 
-पंकज शाह, मैनेजमेंट-फाइनेंशियल कंसलटेंट
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