प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 500, हजार के नोट बंद करने के फैसले से भले ही माया, मुलायम और ममता खुश न हों पर बुजुर्ग काफी प्रसन्न नजर आ रहे हैं। हालांकि वे इस दौर में पुराने दिनों की याद करते हुए कहते हैं कि पहले मुद्रा बहुत ताकतवर थी। अब मुद्रा की शक्ति में गिरावट आई है। चंद लोगों के हाथों में दौलत आई तो मुद्रा शेर से चूहा हो गई।
86 वर्षीय प्रेमशंकर पांडे बताते हैं कि हमारे जमाने में वेतन कम था लेकिन सस्ताई के कारण कम पैसों में खूब सामान आ जाता था। पचास-साठ दशक में घी छह से आठ रुपये प्रति किलो था। सरसों का तेल जो 65-70 के दशक में तीन रुपये किलो था वह आज 145 रुपये पहुंच गया।
बुजुर्गों ने किया पुराने दिनों को याद
85 वर्षीया मेहरु निशा बताती हैं कि बचपन में तो हमारे हाथ इकन्नी, चवन्नी, अठन्नी आना बड़ी बात होती थी। किशोरावस्था तक यही हाल रहें। 1960 में स्थितियां बदलीं और अर्थव्यवस्था में तेजी आने से मुद्रा का प्रसार तेजी से फैला।
तब कागज के नोटों के प्रचलन में तेजी आई। सामाजिक कार्यकर्ता खेमचंद गुप्ता बताते हैं कि जब वे युवा व प्रौढ़ थे तो सबसे बड़ा नोट सौ रुपये का था और खाने पीने का सामान और कपड़े काफी सस्ते थे। 76 वर्षीय जियाउल हसन जैदी का कहना है कि अब तो पांच सौ और हजार रुपये की कीमत ही कुछ नहीं रह गई। 70 वर्षीया रंजीता कौर खां भी यही कहना है।