राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एससीईआरटी) में 54.11 लाख के घपले में माध्यमिक शिक्षा निदेशक चंद्र सिंह ग्वाल को चार्जशीट मिलनी तय है।
जांचों में पाए गए दोषी
दो जांचों में उन्हें दोषी पाया गया है। उत्तराखंड के शिक्षा मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी ने कहा कि ग्वाल के खिलाफ कार्रवाई न हुई तो इससे जनता में गलत संदेश जाएगा।
शिक्षा मंत्री का कहना है कि प्रकरण में शिक्षा निदेशक से जवाब तलब का कोई मतलब नहीं है। अलग-अलग दो जांचों में उन्हें दोषी पाया गया है। शिक्षा निदेशक को सीधे चार्जशीट दी जाएगी। शिक्षा मंत्री ने कहा कि कोई कुछ कहे मुझे इसकी परवाह नहीं है। जो गलत है उसके खिलाफ कार्रवाई होगी।
मैं इस मामले में मुख्यमंत्री से बात करूंगा। अपर मुख्य सचिव एस राजू ने कहा कि वर्ष 2013 में आरके सुधांशु और इससे पूर्व शिक्षा सचिव राकेश शर्मा ने शिक्षा निदेशक चंद्र सिंह ग्वाल के खिलाफ जांच की थी।
यह है मामला
एससीईआरटी में घपले का मामला वर्ष 2005 से 2007 के बीच का है। ग्वाल के एससीईआरटी में अपर निदेशक रहते हुए कंप्यूटर, उपकरण व अन्य सामग्री की खरीद फरोख्त सवालों के घेरे में रही।
वर्ष 2007-08 में इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक आडिटर्स ऑफ इंडिया ने राज्य शिक्षा अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद नरेंद्रनगर का ऑडिट किया। ऑडिट रिपोर्ट में गड़बड़ी साबित हुई थी।
रिटायर होते ही सुरक्षित हो जाएंगे ग्वाल
विवादों में घिरे शिक्षा निदेशक चंद्र सिंह ग्वाल को यदि 30 नवंबर तक चार्जशीट नहीं दी गई तो सरकारी कानून ही उनकी ढाल बन जाएंगे।
कार्मिक के नियम कानूनों के मुताबिक स्पष्ट है कि किसी अफसर को सर्विस में रहते हुए चार से अभी अधिक साल पुराने किसी प्रकरण में शासन की अनुमति लेकर चार्जशीट दी जा सकती है।
लेकिन रिटायरमेंट के बाद केवल उसी मामले में चार्जशीट दी जा सकती है जो कि रिटायरमेंट से पहले चार साल के भीतर घटित हुआ हो। यह मामला 2007 का है, इसलिए रिटायरमेंट के बाद ग्वाल के खिलाफ किसी भी तरह की कार्रवाई का रास्ता बंद हो जाएगा।
दरअसल, शिक्षा निदेशक चंद्र सिंह ग्वाल को सूचना आयुक्त जैसे अहम पद पर बैठाए जाने की चर्चा कई दिन से हो रही है। दो दिन पहले इसी लिए ग्वाल के खिलाफ जारी होने वाली चार्जशीट को मुख्यमंत्री हरीश रावत ने रोक दिया।
नियमों बहुत स्पष्ट हैं कि यदि किसी सरकारी अधिकारी को सर्विस में रहते हुए जिस मामले की चार्जशीट दी जानी है वह प्रकरण यदि चार साल से ज्यादा पुराना है तो शासन की अनुमति से ही चार्जशीट देने की कार्रवाई हो सकती है।
लेकिन रिटायर के बाद यह नियम शून्य हो जाता है और रिटायर हुए अफसर को केवल उसके द्वारा किए गए उसी कृत्य के लिए आरोप पत्र दिया जा सकता है जो कि आरोप पत्र निर्गत होने की तिथि से चार साल से ज्यादा पुराना न हो।
रिटायरमेंट के बाद कोई रास्ता नहीं बचेगा
शिक्षा निदेशक ग्वाल के खिलाफ यह मामला 2005-2007 का है। यानी इसके चार साल 2011 में पूरे हो चुके हैं। इसीलिए अब चार्जशीट जारी करने के लिए शासन की अनुमति की जरूरत पड़ी। लेकिन रिटायरमेंट के बाद कार्रवाई के लिए कोई रास्ता नहीं बचेगा।
इस तरह ग्वाल को बचाने में लगे रसूखदार लोग अपने आपरेशन में कामयाब हो जाएंगे। वैसे भी ग्वाल ने सीएम के पास जाकर जिस तरह से अपनी सफाई दी, मुख्यमंत्री हर दोषी के लिए यह रियायत नहीं देते।