केंद्र से लेकर उत्तराखंड सरकार तक विकास और पर्यावरण के अबूझे संतुलन की अंतहीन बहस के बीच टिहरी जिले के मलेथा गांव के खेतों में धान की बालियां सुनहली होकर पकने लगी हैं।
महीने के आखिर तक फसल काटने लायक हो जाएगी। लेकिन यहां के किसानों की तनी मुट्ठियों में हंसिए के बजाय विरोध-प्रदर्शन के बैनर हैं। गुस्से की वजह है माधो सिंह भंडारी के इस सुंदर से गांव में एक, दो नहीं, पूरे पांच स्टोन क्रशरों को मंजूरी।
पहाड़ पर कृषि क्रांति में अग्रदूत माने जाने वाले इस गांव के लोग कहते हैं कि इतने सारे क्रशर उनके खेती बर्बाद कर देगा। पत्थर तुड़ाई से उड़ने वाला महीन चूरा आबोहवा में घुलकर यहां के जीवन और जीविका को खतरे में डाल देगा।
करीब एक माह से आंदोलन के बावजूद पहाड़ों पर उद्योगों का जाल बिछाने की कोशिशों में जुटी सरकार तक उनकी आवाज अभी अनसुनी ही है।
हुई थी तकनीकी कृषि विश्वविद्यालय की घोषणा
बात वर्ष 2005 की है। मलेथा में एक समारोह में आए तत्कालीन कृषि मंत्री महेंद्र सिंह माहरा ने यहां की उर्वर भूमि और अच्छी उपज को को देख गांव में तकनीकी कृषि विश्वविद्यालय बनाने की घोषणा की थी। बाद में भाजपा सरकार में कृषि मंत्री रहे त्रिवेंद्र रावत ने इस घोषणा में ‘आदर्श गांव’ भी जोड़ा।
समय-समय पर मंत्री रहते मातबर सिंह कंडारी, दिवाकर भट्ट और मौजूदा मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी ने भी कमोबेश ऐसी ही बातें कहीं। नेताओं पर भरोसा करें तो मलेथा गांव को और संवरना था, और खुशहाल और तरक्कीयाफ्ता होना था। लेकिन उससे छल किया गया।
गांव के पास बिछे उपखनिज के खजाने पर खनन के सौदागरों की ललचाई नजरें गड़ गई हैं। जिस मलेथा को आदर्श कृषि की मिसाल बनाने का वादा था, उसकी नई पहचान क्रशर उद्योग से जुड़ने जा रही है। समूचे टिहरी जिले के लिए मंजूर हुए सात स्टोन क्रशर में से पांच अलकनंदा की ओट में बसे इस अभागे गांव के हिस्से में डाल दिए गए हैं।
पहले दो की बात थी। एकाएक तीन और क्रशर लगाने का फैसला हुआ तो गांववालों का सब्र जवाब दे गया। 13 अगस्त से उन्होंने अपने गांव को बचाने की कमान संभाल रखी है। उनका कहना है कि इन क्रशरों से निकलने वाला पथरीला पाउडर हवा में घुलकर फेफड़ों और खेतों को बर्बाद कर देगा।
पांच क्रशरों से बिगड़ेगा पर्यावरण संतुलन
गांववालों के आंदोलन को समर्थन देने स्थानीय विधायक और कैबिनेट मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी भी 21 अगस्त को धरनास्थल पहुंचे और माना कि एकसाथ पांच क्रशरों से यहां का पर्यावरण संतुलन बिगड़ेगा। लेकिन जब मंत्री भी क्रशर न रद्द करवा सके तो उनके खिलाफ भी गुस्सा भड़क गया।
7 सितंबर को धरनास्थल पर ही नैथानी के खिलाफ नारेबाजी की गई। 23 अगस्त को पर्यावरणविद अनिल जोशी के नेतृत्व में ग्रामीणों ने कीर्तिनगर तक रैली निकाल एसडीएम कार्यालय का घेराव भी किया। पूर्व मंत्री दिवाकर भट्ट से मिला आश्वासन भी किसी काम न आया।
जैसे जैसे दिन गुजर रहे हैं, यह आंदोलन धारदार होता जा रहा है। करीब डेढ़ हजार की आबादी वाले इस गांव में लोगों ने सारे कामकाज छोड़ खुद को आंदोलन में झोंक दिया है। उनका संकल्प है कि सिर कटा देंगे पर सेरा (सिंचित खेत) नहीं देंगे।
किसानों ने ऐलान कर दिया है कि धान की कटाई छोड़ देंगे पर आंदोलन नहीं छोड़ेंगे। अब महिलाएं और बच्चे भी सब काम छोड़ सड़क पर उतर आए हैं। क्रशरों को मंजूरी रद न करने पर 16 सितंबर को राष्ट्रीय राजमार्ग जाम कर और भूख हड़ताल शुरू कर सरकार के कानों तक बात पहुंचाने की तैयारी है।
16वीं सदी की गूल खतरे में, खेती होगी खत्म
मलेथा के जिन खेतों को सींचने के लिए माधो सिंह भंडारी ने अपने बेटे को देवी पर कुर्बान कर दिया था, अब उन्हीं खेतों को शासन-प्रशासन ही कुर्बान कर रहा है। ठीक अलकनंदा के किनारे और श्रीनगर रूट के इस गांव में पहाड़ का सीना चीरकर माधो सिंह ने गांव के खेतों के लिए पानी का इंतजाम किया था।
बेहद उर्वर जमीन होने से मलेथा को पहाड़ पर कृषि क्रांति का अग्रदूत माना जाता है। इसकी एक वजह है 16वीं सदी की ऐतिहासिक सिंचाई गूल। इस गूल से पांच हजार नाली भूमि की सिंचाई होती है।
क्रशरों से इसकी दूरी महज 500 मीटर है। क्रशरों से गूल को क्षति पहुंचेगी और सिंचाई का जरिया खत्म हो जाएगा। साथ ही खेतों पर भी बारीक पथरीले चूरे की परत बिछने का खतरा है।
क्रशरों के लिए मलेथा ही क्यों?
दरअसल मलेथा गांव की भोगोलिक स्थिति क्रशर कारोबारियों को लुभा रही है। यह गांव हाईवे के पास और अलकनंदा नदी के किनारे बसा है।
अच्छी क्वालिटी का पत्थर नदी से तो मिलेगा ही, आसानी से हाईवे के जरिए तैयार माल कहीं भी भेजा जा सकेगा।इसके अलावा श्रीनगर यहां से महज छह किलोमीटर और कीर्तिनगर तीन किलोमीटर है। श्रीनगर में बिल्डिंग मैटीरियल का धंधा जोरों से चल पड़ेगा।
नंवबर 2011 में तत्कालीन भाजपा सरकार ने हर जिले में अधिकतम दस स्टोन क्रशर लगाने की अनुमति दी थी। इसके लिए पर्वतीय इलाकों में केवल डेढ़ एकड़ तो मैदानी इलाकों में पांच एकड़ जमीन की शर्त रखी गई थी। तब सरकार ने स्टोन क्रशिंग को एक उद्योग की तरह देखते हुए बाकायदा साठ लाख रुपए की सब्सिडी देने की भी घोषणा की थी।
नीति को मंजूरी देते समय सरकार की दलील थी कि इससे पर्वतीय जिलों में रोजगार पैदा होगा और बिल्डिंग मैटीरियल की कमी दूर होगी। पर काश की नीति में कोई ऐसा नुक्ता भी होता कि किसी एक ही जगह पांच-पांच क्रशर न बिछा दिए जाएं ताकि मलेथा जैसा कोई गांव बर्बादी की चपेट में न आने पाता।
मलेथा गांव में लगने वाले सभी क्रशरों को मानकों के तहत स्वीकृति दी गई है।
- दीपेंद्र नेगी, एसडीएम कीर्तिनगर