मलेथा को हराभरा करने के लिए बहुत पहले माधो सिंह भंडारी ने जिद्द की थी और नहर बनाकर इस भूमि को हरियाली की कालीन बना दिया। कुछ इसी तरह की जिद्द इस बार ग्रामीणों ने की।
स्टोन क्रशर लगा कर मलेथा की हरियाली छीनने की जब कोशिश हुई तो आंदोलन छेड़ दिया। आखिरकार मलेथा के ग्रामीणों के आगे सरकार को झुकना पड़ा। शनिवार को जिलाधिकारी ने मलेथा में स्वीकृत चार स्टोन क्रशर संचालन की अनुमति रद्द कर दी है।
प्रदेश सरकार की ओर से मलेथा में चार स्टोन क्रशरों को स्वीकृति दी गई थी। इनमें देवेंद्र दत्त बलूनी के स्टोन क्रशर को 12 फरवरी 2014 और दिनेश सिंह पडियार के स्टोन क्रशर को 28 जून 2014 को स्थापित करने के आदेश हो गए थे। ये दोनों स्टोर क्रशर स्थापित तो हो गए हैं लेकिन इसे शुरू नहीं किया गया है। अरविंद रणावत और रैपाल सिंह बिष्ट के स्टोन क्रशर का मामला पाइप लाइन में है।
ग्रामीणों के आगे झुकी सरकार
स्टोन क्रशर लगाने के विरोध में क्षेत्र के लोगों ने आंदोलन शुरू कर दिया। जनाक्रोश के बाद सीएम हरीश रावत ने 14 सितंबर को श्रीनगर दौरे के दौरान डीएम युगल किशोर पंत को स्टोन क्रशरों की समीक्षा के निर्देश दिए थे।
डीएम पंत ने बताया कि मलेथा क्षेत्र के लिए स्वीकृत चारों स्टोन क्रशरों के संचालन की अनुमति रद्द कर दी गई है। वहीं कीर्तिनगर के तहसीलदार बीएस मंडागी ने बताया कि उन्हें डीएम के आदेश की प्रति मिल चुकी है। जिसे वह रविवार को संबंधित पक्ष को तामील करा देंगे।
बोले सीएम
मलेथा में किसी प्रकार के स्टोन क्रशर या ऐसी किसी गतिविधि को नहीं चलने दिया जाएगा। जिलाधिकारी को इस संबंध में क्रशर गतिविधियों पर रोक लगाने के निर्देश दिए गए हैं।
-हरीश रावत, मुख्यमंत्री।
मानकों पर मनमानी कर दी गई अनुमति
अगर मानकों की बात की जाय तो मलेथा में एक भी स्टोन क्रशर को मंजूरी नहीं मिलनी चाहिए। लगता है कि अनुमति देते समय अफसरों ने राजस्व विभाग, खनन, वन, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और भूगर्भ विज्ञानियों के तय मानकों की नियमावली पढ़ी ही नहीं है।
क्रशरों से होने वाले नुकसान पर भी शायद चर्चा नहीं की गई। अगर ऐसा होता तो स्कूल, मंदिर, आबादी और वृक्षों से आच्छादित मलेथा में क्रशरों को कतई स्वीकृति नहीं मिल पाती।
मलेथा में दो क्रशर लग चुके हैं, जिनमें कुछ समय तक काम भी चला पर 13 अगस्त से ‘मलेथा आंदोलन’ के बाद से ये क्रशर भी बंद हैं। तीन अन्य क्रशर संचालकों ने भी साइड डेवलपमेंट का काम बंद कर रखा है।
कई तरह से टूट रहे हैं मानक
पर्वतीय क्षेत्र में स्टोन क्रशर लगाने के लिए सरकारी वन से न्यूनतम दूरी 100 मीटर होनी चाहिए। मलेथा में दो क्रशर आरक्षित वन क्षेत्र से 50 से 60 मीटर तक की ही दूरी पर हैं। इतनी ही दूरी पर ग्रामीणों की नाप भूमि भी है। जहां बहुउपयोगी तथा बहुमूल्य खैर के वृक्ष हैं।
इसी तरह, मलेथा ग्राम पंचायत का हिस्सा रहे चौपड़िया गांव में स्वीकृत क्रशर तो नदी से 50 मीटर दूर भी नहीं है, जबकि नदी से क्रशर 100 मीटर दूर होने चाहिए। मानक कहते हैं कि धार्मिक स्थल से न्यूनतम दूरी 125 मीटर होनी चाहिए, लेकिन यहां तो गुरु माणिकनाथ मंदिर और माधो सिंह भंडारी स्मारक स्वीकृत क्रशरों से 75 मीटर दूर भी नहीं है।
बता दें कि हर वर्ष रोपाई के पहले दिन ग्रामीण ढोल-नगाड़ों के साथ लोग यहां पारंपरिक रूप से पूजा-अर्चना करते हैं। यहां का पुराना नागराजा मंदिर भी मानकों में तय दूरी की जद में ही हैं। स्वीकृत हुए क्रशर बस्ती से महज 30-40 मीटर की ही दूरी पर लग रहे हैं, जबकि यह दूरी कम से कम 175 मीटर होनी चाहिए।