फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

देहरादून: सड़क बनाने के काम आएगी पराली, भारतीय पेट्रोलियम संस्थान ने बायो-बाइंडर प्रौद्योगिकी का किया अनावरण

Wed, 05 Aug 2026 05:00 PM IST
Renu Saklani अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून

सार

बायो-बाइंडर प्रौद्योगिकी कृषि एवं बायोमास अपशिष्ट को पेट्रोलियम-आधारित बिटुमेन के पर्यावरण-अनुकूल विकल्प में परिवर्तित कर सतत सड़क निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है।

विज्ञापन
पराली (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

अब हर साल पराली जलाने से होने वाली प्रदूषण की समस्या से निजात मिलने वाली है। सीएसआईआर भारतीय पेट्रोलियम संस्थान ने बायो बाइंडर प्रौद्योगिकी का अनावरण किया, जिसके तहत कृषि व बायोमास अपशिष्ट (विशेषकर धान की पराली) का इस्तेमाल करके सड़कें बनाई जाएंगी।

आईआईपी ने बायो-बाइंडर प्रौद्योगिकी पर आयोजित प्रौद्योगिकी प्रदर्शनी कार्यक्रम किया, जिसमें वरिष्ठ वैज्ञानिकों, उद्योग जगत के अग्रणी प्रतिनिधियों व अनुसंधान सहयोगी शामिल हुए। आईआईपी निदेशक डॉ.हरेंद्र सिंह बिष्ट ने कहा कि बायो-बाइंडर प्रौद्योगिकी कृषि एवं बायोमास अपशिष्ट को पेट्रोलियम-आधारित बिटुमेन के पर्यावरण-अनुकूल विकल्प में परिवर्तित कर सतत सड़क निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

बायो बाइंडर तकनीक के तहत शिलांग स्थित राष्ट्रीय राजमार्ग-40 पर 100 मीटर लंबे बायो-बाइंडर परीक्षण खंड का दीर्घकालिक मूल्यांकन सफलतापूर्वक पूरा हो चुका है। सफल परिणामों के आधार पर आंध्र प्रदेश सरकार ने पांच किलोमीटर लंबा बायो-बाइंडर आधारित सड़क निर्माण मूल्यांकन कार्यक्रम शुरू किया है। सीएसआईआर-सीआरआरआई सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय, एनएचएआई और भारतीय सड़क कांग्रेस के साथ मिलकर इसके तकनीकी दिशा-निर्देश तैयार कर रहा है। कार्यक्रम में सीएसआईआर-सीआरआरआई के निदेशक डॉ. सी रवि शेखर व उद्योग जगत के प्रतिनिधि मौजूद रहे।

विज्ञापन
विज्ञापन

कोई भी अपशिष्ट बेकार नहीं जाएगा

सीएसआईआर-एएमपीआरआई भोपाल के निदेशक डॉ. थल्लाडा भास्कर ने शून्य-अपशिष्ट बायो-रिफाइनरी की परिकल्पना प्रस्तुत की, जिसमें प्रसंस्करण के दौरान प्राप्त हर घटक से अधिकतम मूल्य प्राप्त किया जाता है। पायरोलिसिस प्रक्रिया से प्राप्त जलीय अंश (एक्वियस फ्रैक्शन) को एक पेटेंटयुक्त जैविक कीटनाशी के रूप में विकसित किया गया है। भंडारण और परिवहन की चुनौतियों से निपटने के लिए इसे एक स्थिर पाउडर रूप में भी विकसित किया गया है, जिसका कृषि क्षेत्र में उपयोग के लिए मूल्यांकन किया गया है।

ये भी पढे़ं...Uttarakahnd: देहरादून और बागेश्वर में बहुत भारी बारिश का ऑरेंज अलर्ट, आज स्कूल और आंगनबाड़ी केंद्र बंद

अब ऐसे तैयार होगा सड़क का डामर

इसके लिए धान की पराली और अन्य सूखे पौधों या कचरे का उपयोग होता है। पायरोलिसिस प्रक्रिया के तहत कचरे को ऑक्सीजन के बिना बहुत तेज गर्मी में प्रॉसेस करके बायो-ऑयल बनाया जाता है। इस बायो-ऑयल को सुधार कर पारंपरिक डामर (बिटुमेन) में 20 से 30 प्रतिशत तक मिलाया जाता है। जिससे सड़क का निर्माण होता है।


 

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें