वर्ष 2003 में उत्तराखंड में हुए दारोगा भर्ती घोटाले में सीबीआई की ओर से पूर्व डीजीपी और एडीजीपी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल होने के बाद मुकदमा शुरू हो गया है।
लेकिन जिन अभ्यर्थियों के अंक बढ़ाए गए उनके खिलाफ कोर्ट में चार्जशीट नहीं पहुंची है। सूत्रों की मानें तो सीबीआई को उन पूर्व दारोगाओं के खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं मिले हैं। ऐसे में चार्जशीट दाखिल नहीं की जा सकी है।
चार्जशीट में पूर्व डीजीपी पीडी रतूड़ी और एडीजीपी राकेश मित्तल पर सात अभ्यर्थियों के अंक सात से 100 तक बढ़ाने का आरोप है।
हमारा क्या दोष?
जिन अभ्यर्थियों के अंक बढ़ाए गए, उनमें से एक का कहना है कि यह अफसरों की लापरवाही है। इसमें उनकी कोई भूमिका नहीं है। इसके बावजूद उन्हें नौकरी से यह कहकर हटाया गया कि प्रोबेशन पीरियड खत्म हो चुका है।
अभ्यर्थी का कहना है कि यदि वे आरोपी होते तो सीबीआई उनके खिलाफ चार्जशीट दाखिल करती। इसके अलावा प्रोबेशन पीरियड के बजाय सीधे आरोपी कहकर बर्खास्त कर दिया जाता।
गुरुजी बने हटाए गए दारोगा
वर्ष 2002-03 में दारोगा भर्ती घोटाले में जिन सात अभ्यर्थियों के अंक बढ़ाए गए थे, दो साल बाद उन्हें नौकरी से हटा दिया गया था। एक अभ्यर्थी ने बताया कि इनमें से कुछ अब प्रवक्ता और एलटी शिक्षक बन चुके हैं। कुछ अन्य संस्थानों में काम कर रहे हैं।
चार्जशीट में अधूरे सवाल
- जिन अभ्यर्थियों के अंक बढ़े, उनके खिलाफ आरोप क्यों नहीं?
- अभ्यर्थियों के अंक क्यों बढ़ाए गए, इसकी वजह साफ नहीं?
- अंक बढ़ाने के एवज में पैसों का लेन-देन हुआ था या नहीं?
- अभ्यर्थियों में से किसी की अफसरों से रिश्तेदारी स्पष्ट नहीं।