बैंकों और ट्रैक्टर डीलरों की मिलीभगत से ‘रिफंड’ का खेल खेला जाता है। इसी खेल में बैंकों को हर साल करोड़ों का चूना लगाया जाता है। हर साल कुछ मामले खुलते हैं तो कई मामलों में किसी को इस खेल का पता ही नहीं चलता।
जरूरतमंद किसानों को इस खेल में कुछ पैसा देकर उनके नाम पर दिए गए लोन को कुछ बैंक अधिकारी और डीलर ही चट कर जाते हैं। जानकारों के मुताबिक इस खेल में डीलर और बैंक अधिकारियों के अलावा बैंक के पैनल में शामिल कुछ लीगल एडवाइजर और राजस्व अधिकारियों की भी मिलीभगत होती है।
बैंकों में कृषि लोन पर बड़ा खेल खेला जाता है। इसे आम भाषा में डीलर व बैंक अधिकारी रिफंड का खेल कहते हैं। दरअसल, इसमें कुछ जरूरतमंद और डिफाल्टर किसानों को चुना जाता है। इसके बाद इनकी खतौनी पर मौजूदा लोन के विवरण को बैंक के पैनल में शामिल कुछ लोगों और राजस्व के कर्मचारियों की मदद से हटा दिया जाता है। खतौनी लोन मुक्त दर्शाने के बाद नए सिरे से लोन मंजूर किया जाता है। यह लोन टर्म लोन यानी ट्रैक्टर व अन्य कृषि उपकरण खरीदने के लिए लिया जाता है। जानकारों के मुताबिक इसके बाद इस ट्रैक्टर को किसान को न देकर कहीं और बेच दिया जाता है। इसी प्रक्रिया को रिफंड कहा जाता है।
सलन, किसी किसान को बैंक से छह लाख रुपये का ट्रैक्टर खरीदने के लिए लोन दिया जाता है। इसमें एक लाख रुपये बतौर मार्जिन मनी किसान की ओर से दर्शाई जाती है। जबकि इसे ट्रैक्टर डीलर या अन्य दलाल जमा करते हैं। इसके बाद किसान को पांच लाख रुपये लोन दिया जाता है। इसके बाद इस ट्रैक्टर को चार लाख रुपये में दूसरे राज्यों में बेच दिया जाता है। इस बचे चार लाख रुपये में से किसान को एकाध लाख रुपये दिए जाते हैं। जबकि बाकी पैसा दलाल, डीलर व बैंक अधिकारियों में बांट दिया जाता है। इसके बाद किसान के नाम पर जो पांच लाख रुपये लोन है, उसे किसान दे या न दे, यह उस पर निर्भर करता है। न देने पर उस किसान को डिफाल्टर घोषित कर दिया जाता है। जबकि इसमें डीलर, बैंक अधिकारियों और चंद दलालों की चांदी हो जाती है।