केस 1
घनसाली निवासी 56 वर्षीय कोरोना पॉजिटिव एक व्यक्ति की 11 जून को मौत हो गई थी। दो दिन बाद 13 जून की शाम को इनका अंतिम संस्कार हो पाया। पहले से विभिन्न बीमारियों से ग्रस्त इस व्यक्ति को एक जून को एम्स में भर्ती कराया गया था, जहां चिकित्सकों ने इन्हें बचाने का प्रयास किया, लेकिन वे कामयाब नहीं हो पाए। ...और 11 जून की सुबह इनकी मृत्यु हो गई।
केस 2
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश निवासी एक 25 वर्षीय युवती की भी 11 जून को मौत हो गई थी। लेकिन 13 जून की देर शाम तक उसका शव भी मोर्चरी में ही पड़ा था। कहा जा रहा है कि इनके परिजन अभी तक नहीं पहुंच पाए थे। उनसे लगातार संपर्क किया जा रहा है। यह युवती भी पहले से ही विभिन्न बीमारियों से ग्रसित थी। लेकिन मौत के साथ कोरोना जुड़ गया तो शव के पंचतत्व में विलीन होने में लगातार विलंब हो रहा था।
केस 3
ब्रेम हेमरेज के कारण एम्स में भर्ती हुई 58 वर्षीय लालकुंआ नैनीताल निवासी महिला की मौत एक मई को उपचार के दौरान हो गई थी। अब इनके अंतिम संस्कार की बारी आई तो घाट पर मौजूद दाह संस्कार प्रक्रिया को पूरा कराने वाले पंडितों और अन्य स्टाप ने अपने को कमरे में सिर्फ इसलिए बंद कर लिया, मरने वाली महिला कोरोना पॉजिटिव थी। इस केस में पुलिस की भूमिका सराहनीय रही। कोतवाली पुलिस ने खुद के खर्च पर इस महिला का अंतिम संस्कार कराया और अन्य औपचारिकाएं पूरी की।
केस 4
मुजफ्फरनगर निवासी 25 वर्षीय युवती की तीन जून और मुजफ्फरनगर के ही एक अन्य 26 वर्षीय युवक की चार जून को कोरोना पॉजिटिव पाए जाने के बाद मृत्यु हो गई थी। अगले दिन इनके शवों को कब्रिस्तान में दफनाने की बारी आई तो रानीपोखरी केे ग्रामीणों ने इसका बहिष्कार कर दिया। पूरे दिनभर हंगामा चलता रहा। आखिरकार देर शाम को प्रशासन ने इन दोनों शवों को एक को डोईवाला तो दूसरे को देहरादून में दफनाने का बंदोबस्त किया। इस मामले में प्रशासन की लापरवाही खुलकर सामने आई थी। जिसने ग्रामीणों को पहले विश्वास में नहीं लिया।
कुछ मामलों में शवों के दाह संस्कार में देरी हुई है, लेकिन उसकी अलग-अलग वजह रही हैं। कुछ मामलों में परिवार के लोग समय से नहीं पहुंचे तो कई बार व्यवस्थाओं को बनाने में समय लगा। दाह संस्कार की अभी कोई गाइडलाइन नहीं आई है, हां बॉडी हैंडलिंग की स्पष्ट गाइडलाइन है। इसमें दाह संस्कार का खर्च परिजनों की ओर से उठाया जाता है। जबकि लावरिस लाश के मामले में आपदा मद से प्रशासन की ओर से मदद की जाती है। इसके अलावा भी यदि किसी के पास पैसे नहीं हैं तो तमाम स्वयंसेवी संस्थाएं भी मदद के लिए आगे आ रही हैं। लोगों को भी चाहिए कि वे इसे पैनिक न बनाएं, दाह संस्कार सुरक्षित तरीके से करवाया जा रहा है। सावधानी जरूरी है, लेकिन बहिष्कार समाधान नहीं है। अब प्रशासन की ओर से तहसील क्षेत्र में दाह संस्कार और शवों को दफनाने के स्थान चिह्नित कर लिए गए हैं। आगे कोई दिक्कत नहीं आएगी।
- वरुण चौधरी, उपजिलाधिकारी, ऋषिकेश
पुलिस का काम है कानून व्यवस्था को बनाए रखना और इस काम को हम लोग बाखूबी कर रहे हैं। दाह संस्कार कैसे होगा, कौन क्या व्यवस्थाएं संभालेगा, यह सब देखना शासन-प्रशासन का काम है। हां, एहतियातन दाह संस्कार के समय शांति एवं काननू व्यवस्था बनाए रखने के लिए हमारी पुलिस मौके पर जरूर मौजूद रहती है। इसके लिए भी सभी पुलिस कर्मियों को पीपीई कीट और अन्य जरूरी चीजें उपलब्ध कराई जाती हैं।
- वीरेंद्र सिंह रावत, पुलिस क्षेत्राधिकारी, ऋषिकेश