मानसून में अलर्ट मोड में रहने वाले आपदा प्रबंधन विभाग को कोविड-19 ने उलझा दिया है। राष्ट्रीय स्तर पर कोरोना आपदा घोषित हो चुकी है। इस आपदा के बीच अब आपदा प्रबंधन विभाग को मानसून से निपटने की चुनौती का सामना भी करना पड़ेगा।
मानसून हर बार प्रदेश के लिए बड़ी आपदाएं लेकर आता है। तेज बारिश के कारण कई जगह भूस्खलन की घटनाएं सामने आती हैं। तो कहीं बादल फटने के मामले भी सामने आते हैं। पिछले साल ही प्रदेश ने मानसून के दौरान करीब 300 करोड़ रुपये का नुकसान झेला था।
मुसीबत ये है कि आपदा प्रबंधन विभाग इस समय कोविड से जूझ रहा है। अधिकारियों के मुताबिक एक साथ दो आपदाओं से निपटने की तैयारी मल्टी हेजार्ड के तहत की जाती है लेकिन कोरोना संक्रमण के बीच भूस्खलन, अति वृष्टि जैसे मामलों की कोई तैयारी नहीं की जा सकी है।
केदारनाथ की आपदा के बाद हुआ सुधार
मानसून अब प्रदेश में धमक ही गया है। इस तरह की स्थिति से निपटने के लिए आपदा प्रबंधन विभाग ने केदारनाथ की आपदा के बाद कुछ हद तक तैयारी भी की है। मौसम की जानकारी का एक पूरा नेटवर्क खड़ा किया गया है। 176 से अधिक बारिश मापी केंद्र हैं और 182 से अधिक सेटेलाइट फोन बांटे गए हैं। एसडीआरएफ की पूरी टीम प्रदेश में है।
इतना होने पर भी प्रदेश के सामने सबसे बड़ा संकट आपदा आने पर सुरक्षित स्थानों पर लोगों को भेजने की है। पर्वतीय जिलों में स्कूल आदि को इस तरह का सेंटर बनाया जाता है लेकिन इस बार इन स्थानों पर क्वारंटीन सेंटर बने हुए हैं। उत्तराखंड आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के निदेेशक पीयूष रौतेला के मुताबिक मानसून को देखते हुए सभी जिलाधिकारियों को चार-चार करोड़ रुपये की धनराशि जारी की जा चुकी है। इसके साथ ही अन्य इंतजाम करने को भी कह दिया गया है।