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Coronavirus in Uttarakhand : बगवाल की परंपरा और रोमांच से वंचित रहेंगे लोग, इस तरह पूरी की जाएंगी रस्में

Thu, 23 Jul 2020 01:56 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, पाटी/चंपावत
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मां बाराही धाम देवीधुरा में इस बार लोग बगवाल की परंपरा और रोमांच से वंचित रहेंगे। बगवाल हर साल रक्षाबंधन के दिन होती है, इस बार 03 अगस्त को बगवाल होनी थी, मगर कोरोना महामारी के खतरे के मद्देनजर 28 जून को बगवाल स्थगित करने का निर्णय लिया गया था, जिस पर प्रतीकात्मक रूप से होने वाली पूजा-अर्चना पर अंतिम मोहर लग गई है।

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देवीधुरा में ग्रामीणों के साथ हुई बैठक में चारों खाम और सातों थोक के प्रतिनिधियों ने बगवाल मेले के बजाय सिर्फ रस्म को पूरा करने के तरीकों को अंतिम रूप दिया। अमर उजाला ने 22 जून को ही बगवाल पर लटके खतरे की संभावना जताई थी। मंदिर समिति के अध्यक्ष खीम सिंह लमगड़िया की अध्यक्षता में हुई बैठक में सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं को सोशल डिस्टेंसिंग के साथ प्रतीकात्मक रूप से पूरा किया जाएगा।

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हर खाम के तीन-चार प्रतिनिधि एक साथ मां बाराही देवी की पूजा-अर्चना कर सकेंगे। बगवाल के स्थान पर हर खाम एक-एक फर्रे के साथ बारी-बारी से परिक्रमा करेगा। तय किया गया कि ये संख्या भी दस से अधिक नहीं होगी।

पूजा-अर्चना व मंदिर की परिक्रमा करने के बाद ये बगवाली वीर अपने घरों को चले जाएंगे। पिछले वर्षो तक लगने वाले बाहरी कारोबारियों के साथ ही बाहरी लोगों को अपवाद स्वरूप परिस्थितियों को छोड़ पूजन पर रोक रहेगी। साथ ही बाहरी लोगों को रोकने के लिए प्रशासन से आग्रह किया गया है। 

खामों के मुखिया बद्री सिंह बिष्ट, वीरेंद्र सिंह लमगड़िया, गंगा सिंह, त्रिलोक सिंह बिष्ट, हयात सिंह बिष्ट, त्रिलोक सिंह, रोशन सिंह, मदन बोरा, राजू बिष्ट, बिशन सिंह, ईश्वर बिष्ट, नवीन राणा, दीपक बिष्ट, दिनेश चम्याल, मोहन सिंह, रमेश राणा, तारा सिंह, गोकुल कोहली, प्रकाश महरा, लाल सिंह, रमेश राम, दीपक चम्याल आदि मौजूद थे। 
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चारों खामों ने आपस में युद्ध कर परंपरा को शुरू किया

चार प्रमुख खाम चम्याल, गहरवाल, लमगड़िया और वालिग खाम के लोग पूर्णिमा के दिन पूजा-अर्चना के बाद फल-फूलों से बगवाल खेलते हैं। मान्यता है कि पूर्व में यहां नरबलि दिए जाने का रिवाज था, लेकिन जब चम्याल खाम की एक वृद्धा के अकेले पौत्र की बलि के लिए बारी आई, तो वंशनाश के डर से बुजुर्ग महिला ने मां बाराही की तपस्या की। देवी मां के प्रसन्न होने पर वृद्धा की सलाह पर चारों खामों ने आपस में युद्ध कर मां बाराही धाम मंदिर के खोलीखांड दुबाचौड़ में बगवाल की परंपरा को शुरू किया। तभी से ही बगवाल का सिलसिला चला आ रहा है। 

चंपावत जिले के अब तक प्रभावित हुए धार्मिक मेले

11 मार्च से 15 जून तक प्रस्तावित मां पूर्णागिरि धाम का मेला 17 मार्च के बाद से पूरी तरह रद हुआ। नेपाल सीमा से लगे गुमदेश क्षेत्र का 31 मार्च से 2 अप्रैल तक प्रस्तावित चैतोला मेला भी नहीं हो सका। अलबत्ता मंदिर की परंपरा को पूरा करने के लिए सिर्फ पुजारी व पंडित की मौजूदगी चमदेवल स्थित चौखाम बाबा मंदिर में पूजा-अर्चना कराई गई।

रीठा साहिब का जोड़ मेला स्थगित हुआ। यह मेला 03 जून से 05 जून तक होना था। पांच जुलाई को होने वाला देवीधार महोत्सव में सांस्कृतिक और खेलकूद गतिविधियों को स्थगित हुआ। 10 अगस्त से तीन दिन तक चलने वाले भिंगराड़ा के एड़ी बालकृष्ण मेले को निरस्त करने का निर्णय लिया जा चुका है। धार्मिक आयोजन सिर्फ प्रतीकात्मक रूप में होगा
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