अब आपदा प्रबंधन एवं न्यूनीकरण केंद्र ने भी साफ कह दिया है कि केदारनाथ धाम क्षेत्र से जितनी कम छेड़छाड़ की जाए उतना बेहतर है।
केदारनाथ में किसी तरह का भारी निर्माण केदारनाथ को और अधिक असुरक्षित बना देना है। सलाह है कि केदारनाथ मंदिर और आसपास के परिसर में भारी निर्माण से बचा जाए।
केदारनाथ मंदिर के आसपास के क्षेत्र को लेकर सरकार पहले से ही तीर्थ पुरोहितों और स्थानीय व्यवसायियों के दबाव में है। हाल ही में हुए कैबिनेट फैसले में सरकार यह भी मान लिया था कि केदारनाथ मंदिर परिसर क्षेत्र में भवन निर्माण होगा।
पर अब डीएमएमसी की रिपोर्ट साफ कह रही है कि इस क्षेत्र में किसी तरह की छेड़छाड़ खतरनाक साबित होगी। जून 2013 की आपदा ने इस क्षेत्र की भूगर्भीय संरचना (जियोमॉरफोलॉजी) को पूरी तरह से बदल दिया है।
तटबंद को मजबूत किया जाय
केदारनाथ की यह भू आकृति नए तरीके की है और इससे छेड़छाड़ करने का मतलब है कि इस ढाल को और अधिक अस्थिर करना।
रिपोर्ट में मंदाकिनी और सरस्वती नदी को अपने पुराने रास्ते पर लाने की कोशिश से बचने की भी सलाह दी गई है। कहा गया है कि प्रकृति को अपना काम करने दिया जाए और अगर सरस्वती और मंदाकिनी की एक धारा हो गई है तो उसे अलग न किया जाए।
रिपोर्ट का महत्वपूर्ण पहलु यह भी है कि इसमें साफ तौर पर मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र में भारी निर्माण करने से मना किया गया है। कहा गया है कि यह बेहद हल्का निर्माण हो और जर्जर और टूट फूट गए भवनो के मलवे का उपयोग मंदाकिनी के तटबंद को मजबूत करने के लिए किया जाए।
जाहिर है कि यह रिपोर्ट भी सरकार के लिए परेशानी का सबब बनेगी। सरकार पर तीर्थ पुरोहितों और स्थानीय व्यवसायियों का दबाव है। इन लोगों की मांग है कि आपदा में रहने लायक बच गए भवनों को तोड़ा न जाए और केदारनाथ में पट्टाधारकों को जमीन दी जाए। ऐसे पट्टाधारक करीब सात सौ बताए जा रहे हैं। पट्टाधारकों की जमीन उन्हीं केनाम रहने देने का फैसला सरकार पहले ही कर चुकी है। अब मामला निर्माण पर अटका हुआ है।
ये हैं महत्वपूर्ण बिंदु
-चोराबारी झील का अब अस्तित्व नहीं रह गया है लिहाजा इससे कोई खतरा नही है। मंदिर के पूर्व दिशा में बह रही सरस्वती नदी अब सक्रिय है और इससे कोई छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए।
-यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि केदारनाथ ग्लेशियर केमलबे के ढेर पर स्थित है और जून 2013 की आपदा ने इस मलबे में इजाफा कर दिया है। यहां अब नई भू आकृति बन गई है और इससे किसी भी तरह की छेड़छाड़ इस भू आकृति को और अधिक असंतुलित कर सकती है।
-मंदिर टाउनशिप में किसी तरह का नया निर्माण नहीं होना चाहिए। जरूरी पूजा और इससे संबंधित काम केलोगों के लिए छोटे और बेहद हल्के निर्माण किए जा सकते हैं। इस क्षेत्र में मलबे का ढेर लगा हुआ है। इस क्षेत्र को सुधार कर पुरानी हालत में लाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।
-निर्माण कार्य में किसी तरह के विस्फोटकों का प्रयोग न हो। मलबे के निस्तारण की ठोस व्यवस्था की जाए। इस मलबे का उपयोग सरस्वती नदी के तटबंद को मजबूत करने के लिए किया जाए।
क्या कर रही है सरकार
-केदारनाथ टाउनशिप को लेकर सरकार दबाव में हैं। तीर्थ पुरोहित इस क्षेत्र में पहले जैसी स्थिति के पक्षधर हैं। हालांकि सरकार यह भी कह रही है कि जीआइएस और अन्य वैज्ञानिक एजेंसियों की रिपोर्ट का ध्यान रखा जाएगा।
-मंदाकिनी और सरस्वती को पुराने रास्ते पर लाने का काम करीब दो माह पूर्व किया जा चुका है।
-25 अक्टूबर तक हर हाल में काम शुरू करने का दावा सरकार कर रही है। जिस तरह से भारी मशीन और एमआई 26 का उपयोग करने की कोशिश है उससे लगता नहीं कि केदारनाथ में भू आकृति से छेड़छाड़ नहीं होगी।
-जीएसआई पहले ही इस पर एक रिपोर्ट दे चुका है। जीएसआई से एक बार फिर सरकार ने सलाह मांगी थी। जीएसआई भीयह स्पष्ट कर चुका है कि केदारनाथ क्षेत्र में कौन सा क्षेत्र स्थिर है और कौन सा नहीं।