पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता ब्रह्मदत्त नहीं रहे। वह 88 वर्ष के थे। उनका रविवार तड़के नोएडा स्थित मैक्स अस्पताल में निधन हो गया। वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे और करीब 10 दिन पूर्व उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
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रविवार शाम राजकीय सम्मान के साथ शांति घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनके पुत्र और विधायक नवप्रभात ने चिता को मुखाग्नि दी। मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भी विकासनगर पहुंचकर स्वर्गीय ब्रह्मदत्त को श्रद्धासुमन अर्पित किए।
पूर्व केंद्रीय मंत्री ब्रह्मदत्त प्रखर वक्ता, प्रबुद्ध व्यक्तित्व, सिद्धांतवादी और एक लेखक के तौर पर हमेशा याद किए जाते रहेंगे। राजनीतिक दांवपेंच से अलग ब्रह्मदत्त सहजता और सरलता के स्वामी थे।
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राजनीति की गांव से शुरूआत कर ब्रह्मदत्त ने सीढ़ी दर सीढ़ी सफर तय कर केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह बनाई। चौधरी चरण सिंह हों या इंदिरा गांधी, राजीव गांधी ब्रह्मदत्त सभी के करीबी रहे।
ग्राम प्रधान से कैबिनेट मंत्री का सफर
ब्रह्मदत्त ने 1948 में बतौर एनफील्ड ग्रांट विकासनगर के ग्राम प्रधान के रूप में राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। 1950 में विकासनगर को टाउन एरिया घोषित कर दिया गया। 1952 में हुए चुनाव में ब्रह्मदत्त एक बार फिर विकासनगर के चेयरमैन बने।
वर्ष 1963 तक लगातार चेयरमैन बने रहने के बाद 1971 में जब विकासनगर को नगर पालिका परिषद का दर्जा मिला तो वह चंदन लाल अग्रवाल से चुनाव हार गए।
1970 में वह चौधरी चरण सिंह के भारतीय क्रांति दल के सदस्य बन चुके थे। 1972 में चौधरी चरण सिंह ने उन्हें अपने पास बुलाया और नवक्रांति अखबार में काम करने के लिए कहा। यहां उनकी लेखन प्रतिभा से प्रभावित होकर 1973 में उन्हें अखबार का उप संपादक बना दिया गया।
इंदिरा और राजीव दोनों के रहे करीबी
1974 में उन्हें विधान परिषद के लिए चुन लिया गया। जहां सर्वसम्मति से उन्हें नेता प्रतिपक्ष चुना गया। इस दौरान उन्हें अपने मित्रों के साथ ही विरोधियों से भी सम्मान मिला। 1975 में इमरजेंसी लगने के बाद उन्हें इलाहाबाद की नैनी जेल में बंद कर दिया।
1977 में इमरजेंसी हटने के बाद उन्होंने इंदिरा गांधी की टीम में शामिल होने की इच्छा जताई और दिल्ली में कांग्रेस ज्वाइन कर ली। दल बदलू कानून न होने के कारण 1980 तक वही विधान परिषद के नेता प्रतिपक्ष बने रहे।
1980 में इंदिरा गांधी ने उन्हें मसूरी विधानसभा से चुनाव लड़ाया और भारी भरकम जीत के साथ उन्होंने विधानसभा में कदम रखा। वह 1980-84 तक योजना, ऊर्जा, वित्त मंत्री रहे। 1984 में वे टिहरी लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुने गए।
इंदिरा गांधी की मौत के बाद राजीव गांधी ने उन्हें अपनी कैबिनेट का हिस्सा बनाया और 1986-1989 तक वह केंद्र में वित्त, पेट्रोलियम, तेल एवं प्राकृतिक गैस आदि मंत्रालयों के मंत्री रहे। उत्तराखंड आंदोलन में भी उनकी सक्रिय भागीदारी रही।
राजीव गांधी करते थे राय-मशविरा
ब्रह़्मदत्त कई पूर्व प्रधानमंत्रियों के करीबी रहे। चाहे चौधरी चरण सिंह हों या इंदिरा गांधी, राजीव गांधी ब्रह्मदत्त सभी उनसे राय मशविरा करते थे। खास तौर पर राजीव गांधी को उनका बेहद मुरीद माना जाता था।
नगर पालिका विकासनगर के पूर्व चेयरमैन और स्वर्गीय ब्रह्मदत्त को चुनाव में हराने वाले 84 वर्षीय चंदन लाल अग्रवाल बताते हैं अधिकतर सरकारी कार्यक्रमों में वह राजीव गांधी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े नजर आते थे।
बकौल चंदन अग्रवाल 1951 में जब ब्रह्मदत्त चेयरमैन थे तो वे वाइस चेयरमैन थे। राजनीति की ए बी सी डी उन्होंने ब्रह्मदत्त से ही सीखी। पारिवारिक संबंध होने के कारण भी उनका एक दूसरे के घर आना-जाना लगा रहता था। चंदन लाल अग्रवाल ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने पूर्व केंद्रीय मंत्री को 1971 में हुए नगर पालिका अध्यक्ष के चुनाव में लाटरी सिस्टम से मात दी थी।
ब्रह्मदत्त का सबसे लंबी स्पीच का रिकॉर्ड कोई तोड़ नहीं पाया। 1974 के दौर में उत्तर प्रदेश विधान परिषद में बतौर नेता प्रतिपक्ष उन्होंने लगातार 36 घंटे की स्पीच दी। जिसने उन्हें विधान परिषद में सबसे लंबा भाषण देने वाला व्यक्ति बना दिया।
स्वतंत्रता सेनानी, हिंदी के पुरोधा ब्रह्मदत्त ने देश की आजादी के आंदोलन में भी सक्रिय योगदान निभाया जिसके बाद 1975 में इमरजेंसी के दौरान भी वह इलाहबाद जेल में बंद रहे। अंग्रेजी के अच्छे जानकार होने के साथ ही ब्रह्मदत्त हिंदी प्रेमी भी थे।
हिंदी के प्रचार-प्रसार और रोजमर्रा की जिंदगी में प्रयोग पर बल देते थे। यही कारण था कि वह 1973 में नवक्रांति अखबार के उप संपादक भी बने। इसी के साथ उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखी।
नगर पालिका का चुनाव हारे भी 1971 में जब विकासनगर को नगर पालिका परिषद का दर्जा मिला तो वह चंदन लाल अग्रवाल से चुनाव हार गए।
ब्रह्मदत्त का पूरा प्रोफाइल जन्म: 27 अप्रैल 1926 स्थान: विकासनगर पिता: पंडित देवीदत्त परिवार: पत्नी ऊषा शर्मा और एक बेटा-बेटी शिक्षा: बीए व्यवसाय : समाजसेवा
राजनीतिक सफर 1948 में एनफील्ड ग्रांट के ग्राम प्रधान 1952-63 तक टाउन एरिया विकासनगर के चेयरमैन 1974-80 तक उत्तर प्रदेश विधान परिषद के नेता प्रतिपक्ष 1980 में मसूरी विधानसभा से विधायक चुने गए 1984 में टिहरी लोकसभा सीट से सांसद चुने गए 1990 में सक्रिय राजनीति से सन्यास लिया