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कितना करिश्माई होगा इस बार पीके कार्ड? यहां होगी असल परीक्षा

Thu, 12 Jan 2017 01:19 PM IST
राकेश खंडूड़ी/अमर उजाला, देहरादून
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x - फोटो : pti
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उत्तराखंड के चुनावी समर में सियासी रणनीतिकार प्रशांत किशोर का प्रबंधकीय कौशल क्या कोई कमाल दिखा पाएगा? सवाल यही है कि पहाड़ की तरह ही पथरीली, तीखी और बेहद घुमावदार सियासत के बीच पीके कांग्रेस की नैया पार लगा पाएंगे। वैसे, सत्ता में वापसी का ख्वाब देख रही कांग्रेस को पीके से काफी उम्मीदें हैं।
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यूपी के असहज हालातों के बीच पीके अपने रणनीतिकारों के साथ उत्तराखंड में डेरा डाल चुके हैं। राजनीतिक जानकारों की मानें तो बिहार, यूपी और पंजाब की तुलना में उत्तराखंड बेशक छोटा राज्य है मगर इस पहाड़ी राज्य की सियासत मैदान सरीखी सपाट और सुगम नहीं है।

पीके के टिप्स पर ही चलेगी पार्टी

प्रशांत किशोर व राहुल गांधी - फोटो : amar ujala
बहरहाल, उनके दस्तक देने के साथ ही सांगठनिक स्तर पर चल रही प्रचार की मुहिम ठिठक गई है। अब समूची पार्टी पीके की कैम्पेन टिप्स पर चलेगी। इसकी शुरुआत तीर्थनगरी हरिद्वार से बुधवार को हो चुकी है। पीके की इस पाठशाला में गढ़वाल मंडल के कांग्रेसी जुटे। बृहस्पतिवार को हल्द्वानी में कुमाऊं मंडल के कांग्रेसियों को पीके टिप्स देंगे।

पार्टी सूत्रों की मानें तो पीके की टीम पिछले दो महीने से उत्तराखंड में सक्रिय है और इस दौरान चुनाव प्रचार के उन मुद्दों की पहचान की गई है जो वोटरों के सीधे दिल में उतर सकते हैं। माना जा रहा है कि पीके का पूरा इलेक्शन कैम्पेन मुख्यमंत्री हरीश रावत पर केंद्रित होगा। यानी प्रचार अभियान का चेहरा सिर्फ और सिर्फ हरीश रावत होंगे।

पार्टी के लिए सरकार बनाना अहम: प्रदेश अध्यक्ष

किशोर उपाध्याय - फोटो : file photo
ये संकेत उन प्रचार रथों से भी साफ हो गया जिन्हें पिछले दिनों कांग्रेस भवन में लाया गया था। इन रथों पर सोनिया-राहुल के अलावा केवल मुख्यमंत्री की फोटो थी। रथों से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की तस्वीर गायब होने से कांग्रेसी और खासतौर पर किशोर समर्थक खासे असहज थे, लेकिन बाद में खुद प्रदेश अध्यक्ष ने प्रशांत किशोर को पार्टी का इलेक्शन कैम्पेन सौंपे जाने का खुलासा किया।

बकौल किशोर, ‘प्रशांत किशोर उत्तराखंड में कांग्रेस को सत्ता में लाने के लिए उत्प्रेरक की भूमिका निभाएंगे।’ वह यह भी कहते हैं कि पार्टी के लिए इस समय सरकार बनाना अहम है, इसलिए कुछ मामलों में बदलाव स्वीकारे जा सकते हैं। मजेदार बात यह है कि पीके को चुनाव प्रचार की कमान सौंपने से पहले टीम किशोर सांगठनिक स्तर पर प्रचार की रणनीति बना रही थी। अब इसी सांगठनिक नेटवर्क को प्रशांत किशोर दिशा देंगे।

पीके को कमान से पार्टी में असमंजस

प्रशांत किशोर
प्रशांत किशोर के साथ पार्टी के समन्वयक प्रदेश उपाध्यक्ष जोत सिंह बिष्ट कहते हैं, टीम पीके को बूथ लेवल स्तर तक के पदाधिकारियों व बाजार समितियों का ब्योरा दे दिया गया है। पदाधिकारियों से उनका संपर्क कराया जा रहा है।’ मगर सच यह है कि पीके को प्रचार की कमान सौंपे जाने को लेकर पार्टी में असमंजस है।

इसकी वजह पीके का ऐन चुनाव में प्रकट होना है। कांग्रेसियों के हिसाब से पीके को कम से तीन-चार महीने पहले मैदान उतार देना चाहिए था।
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दुरूह भूगोल, जटिल राजनीति

harish rawat - फोटो : amar ujala
उत्तराखंड का भूगोल जितना दुरूह है, राज्य की राजनीति उतनी ही जटिल। माना जा रहा है कि टीम पीके का इलेक्शन कैम्पेन पोस्टरों व बैनरों के अलावा सोशल मीडिया पर ज्यादा फोकस होगा, मगर ये कैम्पेन 36 मैदानी सीटों पर ही ज्यादा प्रभावी हो सकता है। पहाड़ में इंटरनेट कनेक्टिविटी की समस्या है।

सर्दियां होने की वजह से बिजली की आपूर्ति व इंटरनेट कनेक्टिविटी प्रभावित होती है। चुनावी इतिहास के हिसाब से भ्रष्टाचार और घोटालों विकास के मुद्दों पर हावी रहे हैं। ऐसे में पीके के लिए हरीश सरकार की उपलब्धियों पर वोटरों को रिझाना आसान नहीं होगा।

विकास कभी मुद्दा नहीं रहा
राज्य में अब तीन विधानसभा चुनाव हो चुके हैं। वर्ष 2007 में भाजपा ने कांग्रेस सरकार की लालबत्तियों और 56 घोटालों का मुद्दा बनाया था। वर्ष 2012 में कांग्रेस ने तत्कालीन भाजपा सरकार के भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया। मजेदार बात यह है कि भाजपा ने खंडूड़ी को चेहरा बनाकर तत्कालीन यूपीए सरकार के कथित भ्रष्टाचार और लोकपाल को मुद्दा बनाया। यानी चुनाव भ्रष्टाचार के मुद्दों पर ही फोकस रहा। 
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