यूपी के 1987 बैच के आईएएस अधिकारी अवनीश कुमार अवस्थी का उदाहरण देकर मुख्यमंत्री ने प्रदेश की नौकरशाही को एक तरह से सीख भी देनी चाही ताकि वे अपनी कार्यशैली में बदलाव लाएं और दिलचस्पी के साथ सेवा भाव से काम करें। यह संयोग है कि प्रदेश की नौकरशाही के कामकाज के तौर-तरीकों को लेकर मुख्यमंत्री से पहले मुख्य सचिव भी टिप्पणी कर चुके हैं।
दो दिन पहले ही मुख्य सचिव डॉ. एसएस संधु को सचिवालय में तैनात सभी विभाग प्रमुखों को ताकीद करना पड़ा कि वे समीक्षा बैठकों में पूरी तैयारी के साथ आएं। यह बड़ा प्रश्न है कि उच्चाधिकारी बैठकों में शामिल होने से पहले विषयों की तैयारी क्यों नहीं करते? उन्हें बैठकों में जवाब देने के लिए अपने अधीनस्थों पर निर्भर क्यों रहना पड़ता है? जानकारों के मुताबिक यह भी देखना होगा कि बैठकों से पहले नौकरशाहों को उसमें शामिल होने के लिए कितना समय मिल रहा है।
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कई बार विभागीय मंत्री और उच्चाधिकारियों की बैठकें एक ही दिन में कई बार समय के कम अंतर में होती हैं। राजभवन और विधानसभा के स्तर पर भी कई बार बैठकें बुलाई जाती हैं। इन बैठकों के मध्य मुख्यमंत्री की भी लगातार बैठकें होती हैं। इन बैठकों के बीच नौकरशाहों के पास होमवर्क का कितना समय बचता है, यह भी गौर करने वाली बात है। लेकिन सरकारी तंत्र की ये सारी व्यवस्थाएं उत्तरप्रदेश में भी हैं। इन सबके बीच अपर मुख्य सचिव स्तर के अधिकारी की स्वत: स्फूर्त सक्रियता पर मुख्यमंत्री का कायल होना बेवजह नहीं है।